दिल के किसी न किसी कोने में भड़ास जरूर तिलमिला रही होगी। भड़ास की आग जरूर निकालिए, ताकि जलने वाले बच न पाएं। sarviind@gmail.com परभेजें।

Saturday, January 30, 2010

आज भी हनुमान से नाराज हैं लोग


सबसे बड़ी चीज होती है विश्वास। पर जब उस पर चोट पहुंचती है तो पीड़ा देनेवाले को बख्शा नहीं जाता है। फिर चाहे वह देवता या भगवान ही क्यों न हो। जी हाँ! दुर्गम पर्वतॊं पर बसा एक गांव ऐसा भी है जहां के लोग आज भी हनुमान जी से सख्त नाराज हैं। कारण कि हनुमान ने उन लोगों के आराध्य देव पर चोट पहुंचायी है और सरासर अहित किया है। यह आराध्य देव कोई और नहीं स्यंव साक्षात ‘पर्वत ही हैं, जिसका नाम है-द्रोणागिरी। सभी जानते हैं कि इस पर्वत में संजीवनी बूटी विद्धमान होने से हनुमान एक भाग तोड़कर ले उड़े थे। इसी पुराण-प्रसिद्ध द्रोणागिरि पर्वत की छांव में बसे हनुमान से नफरत करने वाले गांव का नाम है-द्रोणागिरि।
इस बारे में द्रोणागिरि गांव में एक दूसरी ही मान्यता प्रचलित है। बताते हैं कि जब हनुमान बूटी लेने के लिये इस गांव में पहुंचे तो वे भ्रम में पड़ गए। उन्हें कुछ सूझ नहीं रहा था कि किस पर्वत पर संजीवनी बूटी हो सकती है। तब गांव में उन्हें एक वृद्ध महिला दिखाई दी। उन्होंने पूछा कि संजीवनी बूटी किस पर्वत पर होगी? वृद्धा ने द्रोणागिरि पर्वत की तरफ इशारा किया। हनुमान उड़कर पर्वत पर गये पर बूटी कहां होगी यह पता न कर सके। वे फिर गांव में उतरे और वृद्धा से बूटीवाली जगह पूछने लगे। जब वृद्धा ने बूटीवाला पर्वत दिखाया तो हनुमान ने उस पर्वत के काफी बड़े हिस्से को तोड़ा और पर्वत को लेकर उड़ते बने। बताते हैं कि जिस वृद्धा ने हनुमान की मदद की थी उसका सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया।
आज भी इस गांव के आराध्य देव पर्वत क विशेष पूजा पर लोग महिलाओं के हाथ का दिया नहीं खाते हैं और न ही महिलायें इस पूजा में मुखर होकर भाग लेती हैं। गांव की पत्रिता के लिए आज भी जब किसी महिला का बच्चा होता है तो प्रसव के दौरान उस महिला को गांव से अलग काफी दूर नदी के किनारे वाले स्थान पर डेरा बनाकर रखा जाता है। शिशु जनने के बाद ही वह गांव आ सकती है। इस दौरान उसका पति, सास अन्य परिवारजन उसकी मदद करते हैं। :sabhar:hellohimalaya.blogspot.com

Monday, January 25, 2010

यहां ग्रामीण चलाते हैं रेलवे स्टेशन


गणतंत्र की मिसाल देखनी हो तो राजस्थान के झुंझुनूं जिले में चले आइए। यहां आप जानेंगे कि गणतंत्र का मतलब और सोचने पर मजबूर भी होंगे कि ऐसे लोग नहीं तो आज तस्वीर कैसी होती।
जयपुर से 146 किलोमीटर की दूरी पर स्थित बलवंतपुरा-चैलासी रेलवे स्टेशन पर पहुंचते ही हमारा सामना एक सुखद आश्चर्य से होता है। यह स्टेशन जन प्रयासों का बेमिसाल नमूना तो है ही, आजाद भारत का एकमात्र स्टेशन भी होगा, जिसे ग्रामीणों ने बनाया तो है ही, प्रबंधन और संचालन भी रेलवे नहीं बल्कि उन्हीं के हाथों में है।
सुनियोजित तरीके से स्टेशन की बागडोर संभाल रहे ये हाथ झुंझुनूं के पांच ग्राम पंचायतों के हैं, जो तूफानी जुनून से भारत के विकास को अपने दम पर ताकत देने में जुटे हैं। बलवंतपुरा-चैलासी स्टेशन ग्रामीणों के संकल्प व प्रतिबद्धता का प्रतीक भी है। वह इसलिए भी क्योंकि पांच साल से पांच पंचायतों के ग्रामीण बिना सरकारी मदद के सफलतापूर्वक स्टेशन का संचालन कर रहे हैं। ये लाग पूंजीपति भी नहीं हैं। इनके गांव में तो बुनियादी सुविधाएं तक नहीं हैं। स्टेशन बनने के पीछे भी बुलंद इरादों का एक पूरा संघर्ष छिपा है। दरअसल, स्टेशन की मांग 1996 से उठ रही थी। आंदोलन के बाद भी जब मांग नहीं मानी गई तो ग्रामीणों ने हताश होने केबजाय नया रास्ता खोज निकाला।
गांव के लोगों ने डेढ़ सौ लोगों से चंदा लेकर पंद्रह लाख रुपए जुटाए और स्टेशन को बनाने में जुट गए। स्टेशन बनने के बाद अब समस्या यहां ट्रेन रुकने और टिकट की थी। जयपुर से लेकर दिल्ली तक कोई अधिकारी नहीं बचा, जिसे इन लोगों ने पत्र न लिखा हो। जद्दोजहद के बाद रेलवे ट्रेन रोकने और टिकट बांटने पर तो राजी हो गया, लेकिन शर्त रखी कि स्टेशन की पूरी व्यवस्था ग्रामीण ही करेंगे। आखिरकार, 3 जनवरी, 2005 को पहली ट्रेन रुकी और ग्रामीणों का सपना सच हुआ। आज आठ ट्रेन रुकती हैं और 300 यात्री सफर करते हैं। यहां टिकट बांटने की कहानी भी बड़ी अजीब है। अगर ट्रेन जयपुर से बलवंतपुरा-चैलासी रेलवे स्टेशन आ रही है तो गार्ड सीकर से और लोहारू से आते समय मुकुंदगढ़ से टिकट लेकर आता है और बांटता है।
स्टेशन पर पूरी व्यवस्था ग्रामीणों के हाथों में है। पानी से लेकर बैठने, टिकट बांटते वक्त लोगों को एक कतार में रखने और खुल्ले पैसे तक का जुगाड़ भी यहां तैनात ग्रामीण ही करते हैं। स्टेशन की व्यवस्था देख रहे चैलासी गांव के 65 वर्षीय बजरंग जांगिड कहते हैं कि हम इस स्टेशन को पूरे देश का आदर्श रेलवे स्टेशन बना देंगे। बकौल जांगिड, रेलवे स्टेशन तो आसानी से बन गया। अब सबसे ज्यादा चुनौतीभरा काम है, स्टेशन को व्यवस्थित करना। (sabhar : lp pant)

Saturday, January 23, 2010

गायब न हो जाए पायल की झनकार!


अरविन्द शर्मा
आठ माह की इस मासूम के सपने उम्र से भी कई बड़े हैं, मगर सपनों के आड़े आ गई है तो उसकी बीमारी। वह चहकना और जीना भी चाहती है। लेकिन यह बीमारी उसे यह सब करने के लिए रोक रही है। ईश्वर ने उसे इस उम्र में ही ऐसा रोग दे दिया है कि वह खुद पूरी तरह सांस भी नहीं ले पाती है। वह सांस ले तो रही है, लेकिन ये सांसें कभी भी किसी भी वक्त थम सकती है। ऐसा नहीं है कि उसका रोग असाध्य है। उसका इलाज है, लेकिन आड़े आ रही है तो आर्थिक तंगी। आठ माह की यह मासूम है राजस्थान के सीकर की पायल। उसे 'ट्राई कस्पिड अट्रेजिया'रोग है।
अपनी मां की गोद में लेटी पायल को देखकर अस्पताल में आने-जाने वाले हर किसी के कदम ठिठक जाते हैं। पायल के माता-पिता आंखों में तो अब पानी ही पानी रहता है। पायल की बीमारी से घबराए वे बार-बार दौड़कर चिकित्सक के पास जाते हैं और दिल्ली जाने की सलाह के साथ वापस लौट आते हैं। चिकित्सकों ने पायल के दिल में 'ट्राई कस्पिड अट्रेजिया' रोग बताया है। इस रोग से दिल रक्त का शुद्धिकरण नहीं कर पाता। पायल की मां रेखा और पिता अशोक शर्मा की मानें तो उन्हें इस रोग की जानकारी करीब 25 दिन पहले हुई। बुखार होने पर वे पायल को यहां एक निजी चिकित्सक के पास ले गए थे। चिकित्सक ने दो दिन तक भर्ती रखने के बाद पायल को जयपुर रैफर कर दिया। जयपुर में चिकित्सकों ने जांच के बाद पायल के दिल में ट्राई कस्पिड अट्रेजिया रोग बताया। साथ ही जल्द दिल्ली ले जाकर ऑपरेशन करवाने की सलाह दी। लेकिन ऑपरेशन का पैसा नहीं होने के कारण उसके माता-पिता वापस सीकर ले आए। पायल के पिता अशोक शर्मा निजी स्कूल में कम्यूटर ट्यूटर का कार्य करते हैं। इस कार्य के लिए उसे तीन हजार रुपए पगार मिलती है। पायल के अलावा उनके दो बेटियां और एक बेटा भी है। बकौल अशोक परिवार का गुजारा ही बमुश्किल हो पाता है। पायल के दिल के ऑपरेशन का खर्चा चिकित्सक ने तीन लाख रूपए बताया है। पायल की मां रेखा ने बताया कि सीकर और जयपुर में इलाज में ही अब तक 35 हजार रुपए खर्च हो गए हैं। उसके भाइयों ने इसमें सहयोग किया है। लेकिन उनकी आर्थिक स्थिति भी इतने पैसों का इंतजाम करने के जैसी नहीं है।
गंभीर है स्थिति
बच्ची को 'ट्राई कस्पिड अट्रेजिया' रोग है। इस रोग में दिल का एक वॉल काम नहीं करता है। इससे रक्त का शुद्धिकरण नहीं हो पाता। ऑपरेशन ही इसका एक मात्र उपाय है। वर्तमान में बच्ची की स्थिति बेहद गंभीर है। जल्द ऑपरेशन की आवश्यकता है। इसे ऑक्सिजन के सहारे रखा गया है। इस परिवार की कमजोर आर्थिक स्थिति को देखते हुए अस्पताल हर संभव सहयोग करने के लिए तैयार है।

Saturday, January 16, 2010

मेरी धरती पर जन्म लेगी ब्रह्मोस मिसाइल


अरविन्द शर्मा
शेखावाटी में पिछले अर्से से शोध, प्राकृतिक चिकित्सा एवं ग्रामीण पर्यटन के लिए जो माहौल बना है, उससे काफी कुछ करने की गुंजाइशों को पंख लग गए हैं। इससे एक बात तो तय हो गई है कि अब घरेलु पर्यटक शेखावाटी के धार्मिक स्थलों पर जात-जड़ूले और विदेशी पर्यटक ओपन आर्ट गैलरी के रूप विलास को देखने ही ही नहीं आ रहे हैं, बल्कि इन सबसे अलग भी यहां बहुत कुछ ऐसा है, जो दुनियाभार को आकर्षित कर रहा है। इसकी वजह यहां की कुछ खासियतें हैं, जो कि इस क्षेत्र की अलग पहचान और प्रतिष्ठा बना रही हंै।
इसी कड़ी में जो नाम शामिल हुआ है, वह वाकिये सोचने पर मजबूर नहीं करता है, बल्कि दुश्मनों के दांत भी खट्टे कर सकता है। देश को एक लाख से अधिक सैनिक दे चुके शेखावाटी की धरा पर अब ब्रह्मोस मिसाइल भी बनाई जाएगी। इसके लिए झुंझुनूं जिले के पिलानी के पास स्थित श्योसिंहपुरा, पीपली व डूलानिया में ब्रह्मोस मिसाइल प्रोडेक्शन सेंटर बनाने की कवायद शुरू हो चुकी है। जिसकी मिट्टी के कण-कण में देशभक्ति का जज्बा खून बनकर दौड़ता हो, सोचो ब्रह्मोस मिसाइल की एक बारगी तो अपने को धन्य ही मानेगी, क्योंकि यहां की मिट्टी पर उसका जन्म जो होने जा रहा है। राजस्थान सरकार ने रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन को सुपसोनिक क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस बनाने का कारखाना स्थापित करने के लिए 80 हैक्टेयर जमीन देने की मंजूरी दे दी है। डीआरडीओ की मानें तो दो साल में यहां मिसाइलों का उत्पादन भी शुरू हो जाएगा। यह कितनी बड़ी खुशी है, खुद पूर्व सैनिक भूराराम की जुबानी सुन लीजिए। कहते हैं, उन्होंने भी सेना में रहकर देश सेवा की है तथा अब उनके गांव में ही ब्रह्मोस मिसाइल का निर्माण उनके लिए सुखद पल है।

अमित जी, यह ऑरो 'पा' भी नहीं बोल पाता


अरविन्द शर्मा
आपने अमिताभ बच्चन की हालिया रीलिज 'पाÓ जरूरी देखी होगी और अमितजी के किरदार के कायल भी आप हो गए होंगे। लेकिन हकीकत का ऑरो 'पा' भी नहीं बोल पाता है। और यहां हकीकत में इस ऑरो का नाम अमित है। यह ऑरो न तो चल पा रहा है और न ही ठीक से बैठ पा रहा है। यहां तक की अब वह 'पा' भी नहीं बोल पाता है। चार वर्षीय अमित जयपुर के एक अस्पताल में दस दिन भर्ती रहकर घर लौट आया है। झुंझुनूं जिले से करीब 17 किमी पर बसे शिशियां गांव से आगे कच्चे रास्ते पर एक ढाणी में अमित का घर है। अमित प्रोजेरिया नामक बीमारी से पीडि़त है। अमित के मम्मी-पापा, दादी-दादा भावानात्मक दर्द को दिन-रात जी रहे हैं। उसके घरवालों ने तो अभी यह फिल्म देखी भी नहीं है। मासूम दुबली काया अब उसके बड़े सिर के बोझ को झेल नहीं पाती, उसके शरीर के आधे हिस्से में पेरेलाइसिस भी हो गया है। उसके बिना सहारे दिए सीधे बैठा भी नहीं जाता। फिर भी इस मासूम के दर्द सहने की ताकत गजब है।
बहुत तकलीफ में है असली ऑरो
अमित पूरे घर का चहेता है, यहां तक कि बच्चों का भी। 15 दिन पहले तक वह खूब खेलता था, मस्ती-शैतानी भी करता था, कुछ भी खा-पी लेता। आने-जाने वालों को राम-राम और टाटा भी करता था। याददाश्त भी खूब तेज, अंग्रेजी में बॉडी पाटर््स के नाम भी याद हैं। सैना से रिटायर अमित के बुजुर्ग दादा शिशपाल और पापा राजपाल ने ऐसा कोई डॉक्टर नहीं छोड़ा, जहां उसके ठीक होने की उम्मीद थी। दादी परमेश्वरी और मां अनिता ने कोई मंदिर-देवला नहीं छोड़ा, पर मन्नत फली नहीं। घरवाले बताते हैं कि जब यह डेढ़ साल का था, तभी सये वह ऑरो जैसा दिखने लगा था। दस महीने का हुआ तो सारे बाल उड़ गए और सिर पर नसें साफ उभरती दिखने लगीं। हाथ-पैर बिल्कुल लकड़ी जैसे दुबले होते गए, जिससे सिर का आकार बड़ा होने लगा।
आप चाहते हैं मदद करना
अगर आप अमित की मदद करना चाहते हैं तो 'आपकी खबरÓ ब्लॉग की मुहिम में जुट जाइए। अमित के दादा शिशपाल चौधरी से मोबाइल नंबर 09667288725 के जरिए संपर्क कर सकते हैं या हमें ईमेल करें और कमेंट करें।

Monday, December 21, 2009

अब बापू पर अश्लीलता की गोलियां

रणधीर सिंह
जयपुर
. कमाई के लालच में अंधे हुए लोगों का अब निशाना गांधी बने हैं। अश्लीलता भरी चीजें परोस रातोंरात बेशुमार पैसा कमाने की कुत्सित चाह रखने वालों ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को भी नहीं बक्शा और उन पर अश्लीलता भरी शर्मनाक किताब रच डाली। और अब वह किताब शहर में मजे से बिक रही है। रंगीला गांधी नाम से बिक रही पुस्तक में जिस हद तक अश्लील वर्णन किए गए हैं, उसे देख तो कोई भी शर्मसार हो जाए। यह अश्लील किताब जयपुर में धड़ल्ले से बिक रही है। यहीं नहीं किताब इतनी पापूलर हो रही है कि लोग इसकी फोटो कॉपी करवाकर भी पढ़ रहे हैं। राजस्थान विश्वविद्यालय में भी ये पुस्तक छात्रों के बीच चर्चित हो रही है।

शर्मशार कर देने वाले शब्दों का पुंज

महात्मा गांधी के बारे में ऐसे शब्दों का प्रयोग किया गया है जो पढऩे वाला भी शर्मशार हो जाए। गांधी के बारे में बताया कि वो कैसे लड़कियों को ब्रह्मचर्य का प्रयोग करना सिखाते थे। उसमें दिया हुआ है कि उनकी शेतानियत का भांडा फोड़ उनके ही निजी सचिव निर्मल कुमार बोस ने किया। इस पुस्तक में उस समय की प्रसिद्ध महिलाओं के कुछ अन्य पुस्तकों के हवाले से लिखा गया है तथा महात्मा गांधी के साथ उनके संबंधों के बारे में बताया गया है।

बापू नगर में बापू के नाम
रंगीला गांधी नाम की जो किताब शहर में बेची जा रही है। किताबों के आवरण पृष्ठ पर गांधीजी की फोटो दी गई है, जो अपनी दो शिष्याओं के कंधे पर हाथ रखे दिखाए गए हैं। ये किताब बापू नगर में भी बिक रही है।

कहां से प्रकाशित
किताब पर प्रकाशक का नाम भीम पत्रिका पब्लिकेशंज जालंधर दिया गया है। जिस पर जयपुर में चंद्रवाल साहित्य बुक सेंटर बी 75 नीति मार्ग बजाज नगर नामक बुक सेंटर की मुहर लगी हुई है।

पुस्तक के आवरण पर
रंगीला गांधी नाम पुस्तक के मुख प्रष्ट पर मूल लेखक के नाम के रूप में एल.आर.बाली का नाम दिया हुआ है तथा उनके नीचे अनुवादक के रूप में सूर्यकांत शर्मा का नाम दिया हुआ है। अंतिम पेज पर श्री रतन लाल सांपला संस्थापक बुद्ध ट्रस्ट सोफी पिंड जिला जालंधर पंजाब लिखा हुआ है उसके नीचे लिखा है कि जिनकी प्रेरणा व सहायता से ये पुस्तक प्रकाशित हुई।

आंदोलन की तैयारी
छात्र नेता नरसी किराड़ ने बताया कि इस तरह की किताब की फोटोकॉपी राजस्थान विश्वविद्यालय में भी छात्रों के पास देखी गई हैं। जब महात्मा गांधी जी को राष्ट्रपिता का दर्ज है तो उनके खिलाफ अपशब्द लिखना गलत है। किताब लिखने वालों के खिलाफ आंदोलन चलाएंगे और किताब की होली जलाएंगे।

किसी भी महान पुरूष के चरित्र के साथ ऐसा खिलवाड़ कितना उचित है? हमें जरूर बताएं... sabhar: dainik bhaskar

Friday, December 11, 2009

खुशी उतनी ही दुर्लभ है, जितनी कि तितली

रस्किन बॉण्ड

खुशी उतनी ही दुर्लभ है, जितनी कि तितली। हमेशा खुशी के पीछे-पीछे नहीं भागना चाहिए। अगर आप शांत, स्थिर बैठे रहेंगे तो हो सकता है कि वह आपके पास आए और चुपचाप आपकी हथेलियों पर बैठ जाए। लेकिन सिर्फ थोड़े समय के लिए। उन छोटे-छोटे कीमती लम्हों को बचाकर रखना चाहिए क्योंकि वे बार-बार लौटकर नहीं आते।

कोयल पेड़ की चोटी पर बैठकर आवाज लगाती है। एक और गर्मियां आईं और चली गईं। यह मेरे जीवन की पचहत्तरवीं गर्मियां हैं, जो गुजर गईं। यद्यपि मुझे यह स्वीकार करना चाहिए कि पहली पांच गर्मियों के बारे में मुझे ठीक-ठीक कुछ भी याद नहीं है। शुरू-शुरू में जामनगर की एक गर्मी की मुझे याद है। समंदर में पैडल मारते हुए छोटी सी स्टीमर के बाहर देखना।

पूरे कच्छ की खाड़ी में दूर-दूर तक फैलती हुई निगाहें। देहरादून मंे अप्रैल की एक सुबह, आम की खुशबू से भरी बिखरी हुई हवाएं, नई दिल्ली की लंबी, भीषण तपती हुई गर्मियां, खसखस के पर्दे पर पानी डालता हुआ भिश्ती (उन दिनों एयरकंडीशन नहीं हुआ करते थे)। शिमला में गर्मियों से भरा एक दिन, शिमला में ही गर्मियों में पिता के साथ आइसक्रीम खाना। ये सब उन गर्मियों की बातें हैं, जब मेरी उम्र दस साल से कम थी।

मई की एक अलसुबह मेरा जन्म हुआ था। भरी गर्मियों में ही मेरे पैदा होने की भविष्यवाणी थी। सूर्य के जैसा और कुछ भी नहीं है। मैदानी इलाकों में घने छायादार पीपल या बरगद के तले बैठे हुए आप सूरज के और मुरीद हो जाते हैं। पहाड़ों में सूरज आपको अपने ठंडे कमरे से बाहर निकाल लाता है ताकि आप उसकी भव्यता में चहलकदमी कर सकें। बागों को सूरज की रोशनी चाहिए और मुझे चाहिए फूल।

इसलिए हम दोनों ही साथ-साथ सूरज का पीछा करते हैं। इस पृथ्वी ग्रह पर अपने ७५ वर्षो के जीवन में मैंने क्या सीखा? बिलकुल ईमानदारी से कहूं तो बहुत थोड़ा। बड़ों और दार्शनिकों पर भरोसा मत करो। प्रज्ञा उम्र के साथ नहीं आती है। यह आपके साथ ही पैदा होती है। या तो आपके पास प्रज्ञा होती है या नहीं होती है। ज्यादातर समय मैंने बुद्धि की जगह हमेशा अपने मन, अपने संवेगों की आवाज सुनी है और इसकी परिणति हुई है खुशी में।

खुशी उतनी ही दुर्लभ है, जितनी कि तितली। हमेशा खुशी के पीछे-पीछे नहीं भागना चाहिए। अगर आप शांत, स्थिर बैठे रहेंगे तो हो सकता है कि वह आपके पास आए और आपकी हथेलियों पर बैठ जाए। लेकिन सिर्फ थोड़े समय के लिए। उन छोटे-छोटे कीमती लम्हों को बचाकर रखना चाहिए क्योंकि वे बार-बार लौटकर नहीं आते।

एक शांतचित्तता और स्थिरता हासिल करना कहीं ज्यादा आसान होता है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण वह बिल्ली है, जो हर दोपहरी को सूरज की रोशनी में आराम फरमाने के लिए बालकनी में आकर बैठ जाती है और फिर कुछ घंटे ऊंघती रहती है। एक व्यस्तता भरी सुबह की थकान और तनाव से राहत देने के लिए दोपहर की थोड़ी सुस्ताहट और आराम से बेहतर और कुछ नहीं है।

जैसा कि गारफील्ड कहते हैं : कुछ इसे आलस कहते हैं, मैं इसे गहन चिंतन कहता हूं। किसी धार्मिक आसरे के बगैर जीवन के इस मोड़ पर पहुंचकर मेरे पास उन सब चीजों के बारे में कहने को कुछ है, जो मेरे जीवन में खुशी और स्थिरता लेकर आईं। बेशक किताबें। मैं इन किताबों के बिना जिंदा ही नहीं रह सकता। यहां पहाड़ों पर रहना, जहां हवा साफ और नुकीली है। यहां आप अपनी खिड़की से बाहर नजरें उठाकर उगते और ढलते हुए सूरज के बीच पहाड़ों को अपना माथा ऊंचा उठाए देख सकते हैं।

सुबह सूरज का उगना, दिन का गुजरना और फिर सूरज का ढल जाना। सब बिलकुल अलग होता है। गोधूली, शाम और फिर रात का उतरना। सब एकदम जुदा-जुदा। हमारे चारों ओर ये जो कुछ भी फैला हुआ है, उसके बारीक, गहरे फर्क को हमें समझना चाहिए क्योंकि हम यहां जिंदगी से प्रेम करने, उसे गुनने-बुनने के लिए हैं। किसी दफ्तर के अंदर बैठकर पैसे कमाने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन कभी-कभी अपनी खिड़की से बाहर देखना चाहिए और देखना चाहिए बाहर बदलती हुई उन रोशनियों की तरफ। ‘रात की हजार आंखें होती हैं और दिन की सिर्फ एक।’ लेकिन लाखों लोगों की जिंदगियों में रोशनी बिखेरने वाला वही चमचमाता हुआ सूरज है।

खुशी का रिश्ता मनुष्य के स्वभाव और संवेगों से भी होता है और स्वभाव एक ऐसी चीज है, जिसके साथ आप पैदा होते हैं, जिसे हमने अपने नजदीक या दूर के पुरखों से पाया होता है और प्राय: हम उनके सबसे खराब जीन को ही अपनी जिंदगी में ढोते हैं : चिड़चिड़ा स्वभाव, अनियंत्रित अहंकार, ईष्र्या, जलन, जो अपना नहीं है उसे हड़प लेने की प्रवृत्ति।

‘प्रिय ब्रूटस, गलतियां हमारे सितारों में नहीं होती हैं। वह हममें ही होती हैं, हमारे भीतर ही छिपी होती हैं..’शेक्सपियर प्राय: इस ओर इशारा करते हैं।

और भाग्य? क्या भाग्य जैसी कोई चीज होती है? लगता है कि कुछ लोगों के पास दुनिया का सारा सौभाग्य है। या यह भी आपके स्वभाव और संवेगों से जुड़ी बात ही है? जो स्वभाव ऐसा है कि खुशी के पीछे भागता नहीं फिरता है, उसे ढेर सारी खुशी मिल जाती है। नर्म, संतोषी और कोई अपेक्षा न करने वाले स्वभाव को तकलीफ नहीं होती। वहीं दूसरी ओर जो अधीर, महत्वाकांक्षी और ताकत की चाह रखने वाले हैं, वे कुंठित होते हैं। भाग्य उन लोगों के साथ-साथ चलता है, जिनका मन थोड़ा स्वस्थ होता है और जो रोजमर्रा की जिंदगी के संघर्ष से टूट-बिखर नहीं जाते, जिनमें उसका सामना करने की हिम्मत होती है।

मैं बहुत ज्यादा किस्मतवाला हूं। तकदीर का धनी रहा हूं मैं। मुझे सभी भगवानों का पूरा आशीर्वाद मिला है। मैं किसी खास गहरी निराशा, अवसाद और दुख के बगैर ही पचहत्तर साल की इस बूढ़ी और प्रौढ़ अवस्था तक आ चुका हूं। मैंने सीधा-सादा, साधारण और ईमानदार जीवन जिया है। मैंने वे काम किए, जिसमें मुझे सबसे ज्यादा आनंद आता था। मैंने शब्दों को आपस में जोड़-जोड़कर कहानियां गढ़ी और सुनाईं। मैं जिंदगी में ऐसे लोगों को पाने में सफल रहा, जिनसे मैं प्रेम कर सकता और जिनके लिए जी सकता।

क्या यह सब बस यूं ही अचानक हो गया? सब सिर्फ अचानक ही घट गई किस्मत की बात थी या सबकुछ पहले से ही नियत और तयशुदा था या फिर यह मेरे स्वभाव में ही था कि मैं किसी दुख, घाव या चोट के बिना अपनी जिंदगी की यात्रा में इस आखिरी पड़ाव तक पहुंच पाया?

मैं इस जिंदगी को गहरी भावना, आवेग और शिद्दत से भरकर प्यार करता हूं और मेरी तमन्ना है कि यह जिंदगी बस ऐसे ही चलती रहे, चलती रहे। लेकिन हर अच्छी चीज का कभी न कभी अंत तो होता ही है। एक दिन वह अपने अंत के निकट जरूर पहुंचती है। और आखिर में एक दिन जब मेरी रुखसती का, मेरी विदाई का वक्त आए तो मैं उम्मीद करता हूं कि पूरी गरिमा, सुख और खुशी के साथ मैं इस दुनिया से रुखसत हो सकूं। साभार: हेलो हिमालय ब्लॉग