दिल के किसी न किसी कोने में भड़ास जरूर तिलमिला रही होगी। भड़ास की आग जरूर निकालिए, ताकि जलने वाले बच न पाएं। sarviind@gmail.com परभेजें।

Monday, December 21, 2009

अब बापू पर अश्लीलता की गोलियां

रणधीर सिंह
जयपुर
. कमाई के लालच में अंधे हुए लोगों का अब निशाना गांधी बने हैं। अश्लीलता भरी चीजें परोस रातोंरात बेशुमार पैसा कमाने की कुत्सित चाह रखने वालों ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को भी नहीं बक्शा और उन पर अश्लीलता भरी शर्मनाक किताब रच डाली। और अब वह किताब शहर में मजे से बिक रही है। रंगीला गांधी नाम से बिक रही पुस्तक में जिस हद तक अश्लील वर्णन किए गए हैं, उसे देख तो कोई भी शर्मसार हो जाए। यह अश्लील किताब जयपुर में धड़ल्ले से बिक रही है। यहीं नहीं किताब इतनी पापूलर हो रही है कि लोग इसकी फोटो कॉपी करवाकर भी पढ़ रहे हैं। राजस्थान विश्वविद्यालय में भी ये पुस्तक छात्रों के बीच चर्चित हो रही है।

शर्मशार कर देने वाले शब्दों का पुंज

महात्मा गांधी के बारे में ऐसे शब्दों का प्रयोग किया गया है जो पढऩे वाला भी शर्मशार हो जाए। गांधी के बारे में बताया कि वो कैसे लड़कियों को ब्रह्मचर्य का प्रयोग करना सिखाते थे। उसमें दिया हुआ है कि उनकी शेतानियत का भांडा फोड़ उनके ही निजी सचिव निर्मल कुमार बोस ने किया। इस पुस्तक में उस समय की प्रसिद्ध महिलाओं के कुछ अन्य पुस्तकों के हवाले से लिखा गया है तथा महात्मा गांधी के साथ उनके संबंधों के बारे में बताया गया है।

बापू नगर में बापू के नाम
रंगीला गांधी नाम की जो किताब शहर में बेची जा रही है। किताबों के आवरण पृष्ठ पर गांधीजी की फोटो दी गई है, जो अपनी दो शिष्याओं के कंधे पर हाथ रखे दिखाए गए हैं। ये किताब बापू नगर में भी बिक रही है।

कहां से प्रकाशित
किताब पर प्रकाशक का नाम भीम पत्रिका पब्लिकेशंज जालंधर दिया गया है। जिस पर जयपुर में चंद्रवाल साहित्य बुक सेंटर बी 75 नीति मार्ग बजाज नगर नामक बुक सेंटर की मुहर लगी हुई है।

पुस्तक के आवरण पर
रंगीला गांधी नाम पुस्तक के मुख प्रष्ट पर मूल लेखक के नाम के रूप में एल.आर.बाली का नाम दिया हुआ है तथा उनके नीचे अनुवादक के रूप में सूर्यकांत शर्मा का नाम दिया हुआ है। अंतिम पेज पर श्री रतन लाल सांपला संस्थापक बुद्ध ट्रस्ट सोफी पिंड जिला जालंधर पंजाब लिखा हुआ है उसके नीचे लिखा है कि जिनकी प्रेरणा व सहायता से ये पुस्तक प्रकाशित हुई।

आंदोलन की तैयारी
छात्र नेता नरसी किराड़ ने बताया कि इस तरह की किताब की फोटोकॉपी राजस्थान विश्वविद्यालय में भी छात्रों के पास देखी गई हैं। जब महात्मा गांधी जी को राष्ट्रपिता का दर्ज है तो उनके खिलाफ अपशब्द लिखना गलत है। किताब लिखने वालों के खिलाफ आंदोलन चलाएंगे और किताब की होली जलाएंगे।

किसी भी महान पुरूष के चरित्र के साथ ऐसा खिलवाड़ कितना उचित है? हमें जरूर बताएं... sabhar: dainik bhaskar

Friday, December 11, 2009

खुशी उतनी ही दुर्लभ है, जितनी कि तितली

रस्किन बॉण्ड

खुशी उतनी ही दुर्लभ है, जितनी कि तितली। हमेशा खुशी के पीछे-पीछे नहीं भागना चाहिए। अगर आप शांत, स्थिर बैठे रहेंगे तो हो सकता है कि वह आपके पास आए और चुपचाप आपकी हथेलियों पर बैठ जाए। लेकिन सिर्फ थोड़े समय के लिए। उन छोटे-छोटे कीमती लम्हों को बचाकर रखना चाहिए क्योंकि वे बार-बार लौटकर नहीं आते।

कोयल पेड़ की चोटी पर बैठकर आवाज लगाती है। एक और गर्मियां आईं और चली गईं। यह मेरे जीवन की पचहत्तरवीं गर्मियां हैं, जो गुजर गईं। यद्यपि मुझे यह स्वीकार करना चाहिए कि पहली पांच गर्मियों के बारे में मुझे ठीक-ठीक कुछ भी याद नहीं है। शुरू-शुरू में जामनगर की एक गर्मी की मुझे याद है। समंदर में पैडल मारते हुए छोटी सी स्टीमर के बाहर देखना।

पूरे कच्छ की खाड़ी में दूर-दूर तक फैलती हुई निगाहें। देहरादून मंे अप्रैल की एक सुबह, आम की खुशबू से भरी बिखरी हुई हवाएं, नई दिल्ली की लंबी, भीषण तपती हुई गर्मियां, खसखस के पर्दे पर पानी डालता हुआ भिश्ती (उन दिनों एयरकंडीशन नहीं हुआ करते थे)। शिमला में गर्मियों से भरा एक दिन, शिमला में ही गर्मियों में पिता के साथ आइसक्रीम खाना। ये सब उन गर्मियों की बातें हैं, जब मेरी उम्र दस साल से कम थी।

मई की एक अलसुबह मेरा जन्म हुआ था। भरी गर्मियों में ही मेरे पैदा होने की भविष्यवाणी थी। सूर्य के जैसा और कुछ भी नहीं है। मैदानी इलाकों में घने छायादार पीपल या बरगद के तले बैठे हुए आप सूरज के और मुरीद हो जाते हैं। पहाड़ों में सूरज आपको अपने ठंडे कमरे से बाहर निकाल लाता है ताकि आप उसकी भव्यता में चहलकदमी कर सकें। बागों को सूरज की रोशनी चाहिए और मुझे चाहिए फूल।

इसलिए हम दोनों ही साथ-साथ सूरज का पीछा करते हैं। इस पृथ्वी ग्रह पर अपने ७५ वर्षो के जीवन में मैंने क्या सीखा? बिलकुल ईमानदारी से कहूं तो बहुत थोड़ा। बड़ों और दार्शनिकों पर भरोसा मत करो। प्रज्ञा उम्र के साथ नहीं आती है। यह आपके साथ ही पैदा होती है। या तो आपके पास प्रज्ञा होती है या नहीं होती है। ज्यादातर समय मैंने बुद्धि की जगह हमेशा अपने मन, अपने संवेगों की आवाज सुनी है और इसकी परिणति हुई है खुशी में।

खुशी उतनी ही दुर्लभ है, जितनी कि तितली। हमेशा खुशी के पीछे-पीछे नहीं भागना चाहिए। अगर आप शांत, स्थिर बैठे रहेंगे तो हो सकता है कि वह आपके पास आए और आपकी हथेलियों पर बैठ जाए। लेकिन सिर्फ थोड़े समय के लिए। उन छोटे-छोटे कीमती लम्हों को बचाकर रखना चाहिए क्योंकि वे बार-बार लौटकर नहीं आते।

एक शांतचित्तता और स्थिरता हासिल करना कहीं ज्यादा आसान होता है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण वह बिल्ली है, जो हर दोपहरी को सूरज की रोशनी में आराम फरमाने के लिए बालकनी में आकर बैठ जाती है और फिर कुछ घंटे ऊंघती रहती है। एक व्यस्तता भरी सुबह की थकान और तनाव से राहत देने के लिए दोपहर की थोड़ी सुस्ताहट और आराम से बेहतर और कुछ नहीं है।

जैसा कि गारफील्ड कहते हैं : कुछ इसे आलस कहते हैं, मैं इसे गहन चिंतन कहता हूं। किसी धार्मिक आसरे के बगैर जीवन के इस मोड़ पर पहुंचकर मेरे पास उन सब चीजों के बारे में कहने को कुछ है, जो मेरे जीवन में खुशी और स्थिरता लेकर आईं। बेशक किताबें। मैं इन किताबों के बिना जिंदा ही नहीं रह सकता। यहां पहाड़ों पर रहना, जहां हवा साफ और नुकीली है। यहां आप अपनी खिड़की से बाहर नजरें उठाकर उगते और ढलते हुए सूरज के बीच पहाड़ों को अपना माथा ऊंचा उठाए देख सकते हैं।

सुबह सूरज का उगना, दिन का गुजरना और फिर सूरज का ढल जाना। सब बिलकुल अलग होता है। गोधूली, शाम और फिर रात का उतरना। सब एकदम जुदा-जुदा। हमारे चारों ओर ये जो कुछ भी फैला हुआ है, उसके बारीक, गहरे फर्क को हमें समझना चाहिए क्योंकि हम यहां जिंदगी से प्रेम करने, उसे गुनने-बुनने के लिए हैं। किसी दफ्तर के अंदर बैठकर पैसे कमाने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन कभी-कभी अपनी खिड़की से बाहर देखना चाहिए और देखना चाहिए बाहर बदलती हुई उन रोशनियों की तरफ। ‘रात की हजार आंखें होती हैं और दिन की सिर्फ एक।’ लेकिन लाखों लोगों की जिंदगियों में रोशनी बिखेरने वाला वही चमचमाता हुआ सूरज है।

खुशी का रिश्ता मनुष्य के स्वभाव और संवेगों से भी होता है और स्वभाव एक ऐसी चीज है, जिसके साथ आप पैदा होते हैं, जिसे हमने अपने नजदीक या दूर के पुरखों से पाया होता है और प्राय: हम उनके सबसे खराब जीन को ही अपनी जिंदगी में ढोते हैं : चिड़चिड़ा स्वभाव, अनियंत्रित अहंकार, ईष्र्या, जलन, जो अपना नहीं है उसे हड़प लेने की प्रवृत्ति।

‘प्रिय ब्रूटस, गलतियां हमारे सितारों में नहीं होती हैं। वह हममें ही होती हैं, हमारे भीतर ही छिपी होती हैं..’शेक्सपियर प्राय: इस ओर इशारा करते हैं।

और भाग्य? क्या भाग्य जैसी कोई चीज होती है? लगता है कि कुछ लोगों के पास दुनिया का सारा सौभाग्य है। या यह भी आपके स्वभाव और संवेगों से जुड़ी बात ही है? जो स्वभाव ऐसा है कि खुशी के पीछे भागता नहीं फिरता है, उसे ढेर सारी खुशी मिल जाती है। नर्म, संतोषी और कोई अपेक्षा न करने वाले स्वभाव को तकलीफ नहीं होती। वहीं दूसरी ओर जो अधीर, महत्वाकांक्षी और ताकत की चाह रखने वाले हैं, वे कुंठित होते हैं। भाग्य उन लोगों के साथ-साथ चलता है, जिनका मन थोड़ा स्वस्थ होता है और जो रोजमर्रा की जिंदगी के संघर्ष से टूट-बिखर नहीं जाते, जिनमें उसका सामना करने की हिम्मत होती है।

मैं बहुत ज्यादा किस्मतवाला हूं। तकदीर का धनी रहा हूं मैं। मुझे सभी भगवानों का पूरा आशीर्वाद मिला है। मैं किसी खास गहरी निराशा, अवसाद और दुख के बगैर ही पचहत्तर साल की इस बूढ़ी और प्रौढ़ अवस्था तक आ चुका हूं। मैंने सीधा-सादा, साधारण और ईमानदार जीवन जिया है। मैंने वे काम किए, जिसमें मुझे सबसे ज्यादा आनंद आता था। मैंने शब्दों को आपस में जोड़-जोड़कर कहानियां गढ़ी और सुनाईं। मैं जिंदगी में ऐसे लोगों को पाने में सफल रहा, जिनसे मैं प्रेम कर सकता और जिनके लिए जी सकता।

क्या यह सब बस यूं ही अचानक हो गया? सब सिर्फ अचानक ही घट गई किस्मत की बात थी या सबकुछ पहले से ही नियत और तयशुदा था या फिर यह मेरे स्वभाव में ही था कि मैं किसी दुख, घाव या चोट के बिना अपनी जिंदगी की यात्रा में इस आखिरी पड़ाव तक पहुंच पाया?

मैं इस जिंदगी को गहरी भावना, आवेग और शिद्दत से भरकर प्यार करता हूं और मेरी तमन्ना है कि यह जिंदगी बस ऐसे ही चलती रहे, चलती रहे। लेकिन हर अच्छी चीज का कभी न कभी अंत तो होता ही है। एक दिन वह अपने अंत के निकट जरूर पहुंचती है। और आखिर में एक दिन जब मेरी रुखसती का, मेरी विदाई का वक्त आए तो मैं उम्मीद करता हूं कि पूरी गरिमा, सुख और खुशी के साथ मैं इस दुनिया से रुखसत हो सकूं। साभार: हेलो हिमालय ब्लॉग

स्कूटर की विदाई

कुछ दशक पहले देश के मध्यमवर्गीय घरों में स्कूटर की शान निराली हुआ करती थी। लाइसेंस-कोटा राज और औद्योगिक प्रगति की शुरुआत के उस दौर में वह सालों कतार में लगने के बाद मिलता था और परिवारों को आधुनिक होने का एहसास व पूरे महीने का सौदा-सुलुफ लाने की सुविधा देता था। वही स्कूटर इतना अप्रासांगिक हो चुका है कि उसे बनाने वाली प्रमुख कंपनी बजाज ने अगले वित्त वर्ष से उत्पादन बंद करने की घोषणा की है। स्कूटर की विदाई से भावुक होने की बजाय यह देखना ज्यादा सुखद है कि अब तरह-तरह की कारों और बाइक ने देश के लोगों को नई सुविधा, नई पहचान दी है।

Thursday, December 10, 2009

collage news



Saturday, September 12, 2009

कोई तो बताए हम इन सपनों का क्या करें!

राही
कोई स्वाइन फ्लू से परेशान है, किसी को एड्स का डर है, किसी के डायबिटीज है तो कोई वायरल से ग्रस्त। लेकिन हम सपनों से परेशान है। ऐसे-ऐसे सपने आते हैं कि पूछो मत। अब तो हमें सपनों से डर लगने लगा है। हालांकि कलाम साहब जैसे पहुंचे विद्वानों ने कहा कि जिंदगी में आगे बढऩा है तो सपने देखो। हमने भी यही सोच कर सपने देखने शुरू किए। ऐसा नहीं है कि हमने सपने देखना अभी शुरू किया है। हमें तो बचपन से ही सपने आते थे। हमारे सपनों में तोता, कुत्ता, हाथी, बंदर आते तो जवानी में रेखा, हेमा, वहीदा और बबीता ने आना शुरू कर दिया। आजकल जो सपने आ रहे हैं, वे ही बड़े ही अजीबोगरीब है। अजीबोगरीब ही नहीं ऊटपटांग भी हैं। चलिए कुछ सपने हम आपको सुनाते हैं। एक सपना हमें कुछ महीने पहले आया था। सपने का स्टार्ट ही बड़ा जोरदार था। हमने एक मोटी सी किताब देखी। उस किताब को तैयार करने में सैकड़ो लोग जुटे थे। जब किताब तैयार हो गई तो लोगों ने हमें पकड़ कर उस किताब में बिठा दिया। हमें लगा जैसे हमें किसी लक्जरी कार में बिठा कर सीट बेल्ट बांध दी हो। अचानक वह किताब रेल की तरह चलने लगी और देखते-देखते हम छोटे से बड़े हो गए। अचानक उस किताब को ब्रेक लगा और कुछ मोटे-मोटे लोगों ने हमें पकड़ कर किताब से नीचे फेंक दिया। अब किताब एक पहाड़ बन गई। हम फिसलते हुए ऊपर से नीचे आ रहे थे। हम नीचे एक गड्ढ़े में आ गिरे, जिसमें कीचड़ जैसा कुछ भरा था। इससे पहले कि हम अल्लाह को प्यारे होते हमारी आंख खुल गई। हम पसीने-पसीने हो गए थे। देखा श्रीमती सामने खड़ी कह रही थी, क्योंजी नींद में संविधान-संविधान क्या बड़बड़ा रहे थे। अब बताइए यह भी ससुर कोई सपना हुआ। अब इस सपने का फल किसे पूछने जाएं। सपने बांचने वालों को यह सपना सुनाएं तो वह हंसने के अलावा कुछ नहीं कर सकता। कुछ दिन पहले एक सपना और आया। देखा कि सिर पर पगड़ी बांधे एक बुजुर्गवार ने हमारा हाथ पकड़ा और एक गुफा के सामने ले जाकर खड़ा कर दिया। अचानक उसने जेब से अलादीन का चिराग निकाला। उसे रगड़ा और जोर से चिल्लाया- खुल जा सिमसिम। हमने देखा कि गुफा का दरवाजा खुल गया। हम आंख फाड़कर देख ही रहे थे कि उस बुजुर्गवार ने हमारे जोरदार लात लगाई और हम गुफा में भीतर जा गिरे। गुफा क्या थी पूछो मत। चारो तरफ नोट ही नोट थे। हमने पागलों की तरह नोट उठाकर अपनी जेब से भरना शुरू कर दिया। जैसे ही दौड़ कर हम खजाने से बाहर आए तो एक सफेद आदमी ने हमें पकड़ लिया और जेब से सारा धन निकाल लिया। हमने पूछा कि यह क्या कर रहो। उसने कहा टैक्स ले रहा हूं। जब हमारी जेब खाली हो गई तो हाथ में एक नोट पकड़ा कर कहा- ले जा। भूंगड़े खा लेना। एक झटके में हमारी आंख खुल गई और हमने देखा कि हम खाट के नीचे पड़े हैं। अब आप ही कहें। इन सपनों का हम क्या करें? आजकल हमें ऐसे ही ऊटपटांग सपने आते हैं। क्या यह सपने आते ही रहेंगे या फिर कभी बंद भी होंगे।

Sunday, September 6, 2009

हे विराटरूप धारिणी दालदेवी, तुम्हें नमस्कार है!

सूर्यकुमार पांडेय
हे भारत भूमि के भोले-भाले मानुसों का गृह बजट बिगाडऩे वाली, भावों के मामले में समस्त खाद्यान्नों को पछाडऩे वाली, अपने दिव्य छिलकायित स्वरूप के समान आम आदती की दो भाग बखिया उधेडऩे वाली, तमाम दहलनों के तन-बदन पर अपनी हैसियत का झंडा गाडने वाली, अपने लघु स्वरूप में विराटरूप धारिणी, तड़कामारिणी, चमत्कारिणी दाल देवी, तुम्हें अनंत बार नमस्कार है।
हे देवी, जो रिश्ता वृक्ष का छाल से, बंदर का डाल से, रोटी का थाल से, शेयर का उछाल से, सूखी लकड़ी का टाल से, मरीज का अस्पताल से, जवाब का सवाल से, ट्रेड यूनियन का हड़ताल से, ताल का भोपाल से, उज्जैन का महाकाल से, टूरिस्ट का नैनीताल से, शैंपू का बाल से, बाल का खाल से, खाल का गाल से, पाकिस्तान का टेढ़ी चाल से, फुटबॉल का बंगाल से, घोड़े का नाल से, होली का गुलाल से, कस्टमर्स का मॉल से और मोबाइल का मिस्ड कॉल से, वहीं रिश्ता आदमी का दाल से है। हे इन सहज संबंधों की ध्वंसकारिणी, उच्चभावविहारिणी, हृदयविदारिणी दाल देवी, तुम्हें असंख्य बार नमस्कार है।
हे देखने में अदना, गोल-मटोल बदना, एक गरीब ने तुम्हें हाथ लगाना चाहा, उसे बिजली का झटका लगा। एक मजदूर ने तुम्हारा भाव पूछा और किराने की दुकान पर ही बेहोश हो गया। तुमको जिस भी किसान ने अपना खून-पसीना बहाकर रात-दिन की मेहनत से तैयार किया, तुमने उसके ही होंठों से लगने से इनकार किया। देवी, हमारे पाप क्षमा करो कि हम नीलगाय आदि पशुओं से तुम्हारी रक्षा नहीं कर पाते। तुम्हारी कृश काया को उकठा नामक रोगासुर निरंतर कष्ट प्रदान करता रहता है। हम इसके उपचार में भी अशक्त होते हैं। हे देवी, तुम अपने कोप के प्रकोप को शांत करो। प्रसन्न हो। हे क्षुधानाशिनी, बाजार उपहासिनी दाल देवी, तुम्हेें कोटि-कोटि नमस्कार हैं।
हे देवी, तुम्हारें अनंत रूप हैं। तुम न होती तो मूसलचंद का कोई पूछनहारा न होता। तुम कभी मूंग बनकर छाती पर दली जाती हो तो कभी तुअर बनकर पुअर को सताती हो। कभी मसूर की दाल बनकर मुंह तक को मुंह चिढ़ाती हो तो कभी खीचड़ रूप में पेशेंट का पथ्य बन जाती हो। जूते में बंटती हो। आयात में भी तुम्हीें हो, निर्यात में भी तुम्हीं। तुम रोटी की सहेली हो। भात की गर्लफें्रड हो। तुम हींग और जीरा की प्रिय सहेली हो। तुम बटलोई से कुकर तक की वासिनी हो पर आज तुम्हारा अदहन भी घर-घर में लंका दहन के समान प्रतीत हो रहा है। तुम्हारा न गलना हमें खल रहा है। तुम्हारे अरहरी रूप के भक्तगण क्राई कर रहे हैं, क्योंकि उलटा तुमने ही इन्हें फ्राईं कर डाला है। आज तुम कीमत के मामले में नब्बे के पार हो। बखरी, बोरी, कनस्तर और डिब्बे से फरार हो। हे जमाखोरों की आनंददायिका, लवणयुक्ता, सुस्वादु प्रदायिका, किचन नायिका दाल देवी, तुम्हें शत-शत नमस्कार है।
हे व्यंजनों की अधीश्वरी, हम तुम्हारी शरण में आए हैं। तुष्ट की चिह्वा पर चर्चा रूप में विराजिता हो। आओ, अब साक्षात हमारी चिह्वा पर चरण धरो। हमारे किचन का आधार तुम ही हो। तुम रोटी के साथ उपस्थित होकर दीन जन की क्षुधा तृप्त करने वाली आदि शक्ति हो। तुम बेसन और अनेकानेक फूड्स,स्वीट्स के मध्य स्थित होकर जीभ को तृप्ति प्रदान करनेवाली महाशक्तिदायिका हो। हे गृहदशा विदारिणी, भोजन संवारिणी, लघुस्वरूपा धनहारिणी दाल देवी, तुम्हें नमस्कार है।

Friday, August 21, 2009

गणेशजी के अपमान के लिए दोषी कौन?

यह सवाल मेरे जहेन में काफी दिनों से कोंद रहा है कि क्या प्रथम आराध्य देव श्रीगणेश के अपमान के लिए दोषी आप है? इसका जवाब शायद 'हांÓ है। हर बार गणेश चतुर्थी पर इसी तरह गणेशजी का पमान होता आया है और इस बार भी हम और आप प्रथम पुज्य गणेश भगवान का अपमान करने जा रहे हैं। और वो भी तब जब हम गणेश चतुर्थी पर बड़े श्रद्धाभाव से गणेश को पूजते हैं और मन्नते मांगते हैं। यदि आप यह नहीं चाहते हैं कि आपके हाथों गणेश का अपमान हो तो आईए हमारीमुहिम में शामिल हो जाइए। कौन है इस अपमान के लिए जिम्मेदार है? कैसे इस अपमान को रोका जा सकता है? हमें बताइए। इस गणेश चतुर्थी पर हम और आप मिलकर एक नई जोत जला सकते हैं भक्तिभाव की। हमारी मुहिम में शामिल होने के लिए कमेंट कीजिए। या फिर ईमेल के जरिए अपने विचार भेजे : sarviind@gmail.com


Friday, August 14, 2009

आज 'सूखा दिवस': फिर भी हम आजाद है!

अरविन्द शर्मा
आजादी के मौके पर आज हमें एक तांगे वाले की कहानी याद आ गई। एक तांगे वाले के तांगे में लीडर लोग बैठकर घर से मयखाने जाते थे। आते वक्त वे बतियाते कि आजादी मिलने के बाद सब कुछ बदल जाएगा। गरीब गरीब न रहेगा। गरीबी-अमीरी की खाई पट जाएगी। सबको बोलने की आजादी होगी। जमाखोरों का धन लूटकर गरीबों में बांट दिया जाएगा। लीडरों की बात पर उसे यकीन हो गया। आजादी के दिन उसे लगा कि अब तो मैं आजाद हूं सो चौराहे पर जाकर बढ़ती महंगाई के खिलाफ बोलने लगा- यह कैसा राज। जहां मुझे और मेरे घोड़े को दो मुट्ठी दाल भी न मिले। राज के सिपाही ने यह सुन लिया। वह तांगे वाले के पास गया और उसके दो डंडे लगाकर बोला-अबे ज्यादा चिल्प-पों मत कर। चल भाग यहां से। तांगे वाले को समझ नहीं आया कि यह कैसी आजादी, जहां सच बोलने पर भी डंडे पड़ते हों। यह तो एक कहानी है। लेकिन सवाल आज भी कायम है कि क्या हम आजाद है? विश्व बैंक के मुताबिक, 75 फीसदी भारतीय दो डॉलर प्रतिदिन से कम में जीवन यापन कर रहे हैं। करोड़ों लोग भूखे पेट सोने को मजबूर है। फिर भी हम आजाद है। आम आदमी महंगाई के पंजों में जकड़ा हुआ है और सरकार आंखें मुंदे बैठी है। फिर भी हम आजाद है। आपके जहेन में स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संख्या पर राष्ट्रपति का बयान भी ताजा होगा कि शासन भ्रष्टाचार में फंसता जा रहा है। यह सच भी है। फिर भी हम आजाद है। याद कीजिए स्वतंत्रता दिवस का वो दिन, जब पूरा देश आजादी की खुशियां मना रहा था और गांधीजी एक कमरे में अंधेरा किए आंसू बहा रहे थे। आखिर क्यों? संसद पर आतंकी हमले की घटना, मुंबई पर 26/11 का हमला, मुंबई में सिरियल ब्लास्ट और न जाने कितने हमले। फिर भी हम आजाद है। वो घटनाएं भी याद कीजिए, कई राज्यों में महिलाओं को निर्वस्त्र करके सरेआम पीटा गया। वो दिन भी याद कीजिए, जब गांधीजी की पुरानी चीजें विदेशों में नीलाम हो रही थी, लेकिन सरकार चुप थी। लेकिन फिर भी हम आजाद है।जिन लोगों ने आजादी के लिए बलिदान किया उन्हीं की औलाद सरकारी खजाना लूटने में जुट गई। उनमें और डाकुओं में फर्क सिर्फ इतना था कि डाकू जान जोखिम में डालकर लूट-खसोट करते थे और ये लोग गरीबों के आंसू पोंछने के नाम पर खजानों से माल सूंतते रहे। देखते-देखते नेताओं की तोंद के घेरे में अप्रत्याशित इजाफा हो गया। जो कल तक हाथ पसारे फिरते थे वे धन्नासेठों के बाप बन गए और आम आदमी का शरीर हड्डियों में तब्दील होता गया। लेकिन फिर भी हम आजाद है.......।

मेरी पड़ोसन खाय दही, मोसे कैसे जाय सही

अरविन्द शर्मा
हमारे यहां यह कहावत लंबे समय से चली आ रही है, 'मेरी पड़ोसन खाय दही, मोसे कैसे जाय सही'। ऐसी खबर पिछले दिनों मैंने अखबार में पढ़ी तो बचपन से चौबीस तक की जिंदगी सिनेमा की रील की तरह आंखों के सामने से गुजर गई। दिमाग ने कहा कि नहीं इस बात पर यकीन करना बेमानी है, लेकिन क्या करें यह कमबख्त दिल है की मानता ही नहीं, चाहे कोई कितना भी समझाए। दिल का भी क्या कहना, इसी दौरान कोई खुबसूरत बला आंखों के सामने से गुजरी तो दिल बाबू की ताक-झांक फिर से शुरू हो गई। अगर पड़ोस चैन से रोटी खा रहा है तो वह भी हमें सहन नहीं होता। मेरे पड़ोसी और कुछ साथियों को भी रोटी नहीं पचती है, जब तक हमारी बुराई नहीं कर दें। अब अपने पड़ोसियों को ही देख लो। भारत में क्या चल रहा है? इसकी प्रतिक्रिया अपने देश से ज्यादा पाकिस्तान में होती है। और सीमापार की खबरों ने के लिए भी हम मचलते रहते हैं। ताकना भी कई तरह का होता है। कुछ लोग चोरी-चोरी ताकते हैं। सीधे ताकने की हिम्मत नहीं होती। यह ताका-झांकी किशोरावस्था में चलती है। देखने वाले ऐसे ताकते हैं जैसे आंखों से काजल चुरा रहे हों। युवावस्था में आशिक की नजरें सीधी होने लगती है। पर यहां की कुछ शर्मोहया बची रहती है। दिल में धुकधुकी सी रहती है कि कहीं जिसे ताका जा रहा है वह रिजेक्ट न कर दे। अधेड़ावस्था तक ताका-झांकी में बेशर्मी छा जाती है। लेकिन यहां भी कुछ मानते नहीं है। कुछ लोग बागों में सिर्फ इसलिए घूमने जाते हैं कि वहां खिलती कलियों और फूलों को निहार सकें। अपने कुछ मित्र लोगों को भी यह आदत है। वैसे ताकने-झांकने के लिए बुढ़ापा काफी मुफिद होता है। आदमी उल्लू की मानिद ताकता रहता है पर कोई उस पर ध्यान नहीं देता। बाज शख्स तो सौंदर्य का नजारों से ही नहीं कदमों से पीछा करना शुरू कर देते हैं। ऐसे लोगों को सरे बाजार पिटते देखा गया है। बहरहाल हमारी तो युवाओं को यही सलाह है कि गति से प्रथम सुरक्षा रखें। तेज नजरों और तेज कदमों से दौडऩे की अपेक्षा हौले-हौले चलें। तेज दौडऩे वाले ही ठोकर खाकर गिरते हैं। बेहतर तो यही है कि इस ताका-झांकी की आदत से बाज आ लिया जाए। जिंदगी में एक बरस कम नहीं होता।

Thursday, August 13, 2009

ऐसा होता आया है, होता रहेगा

कैलाश राव
धरना, ज्ञापन और प्रदर्शन। अपने लोकतंत्र में यह तीनों ऐसे पुख्ता हथियार हैं कि इनसे हर तरह की लड़ाई लड़ी जा सकती है। चाहे वह नाजायज ही क्यों न हों। इस पर हमारे देश के कर्मठ कर्मचारियों का एकाधिकार है। जब चाहे तब ज्ञापन, इससे बात नहीं बनी तो प्रदर्शन और फिर भी मामला नहीं बैठे तो धरना। इससे आगे भी व्यवस्थाएं हैं, जैसे पुतला दहन, आमरण अनशन, भूख हड़ताल आदि-आदि।यूं तो इस अचूक शस्त्र का इस्तेमाल भाई लोग बरसों से करते आ रहे हैं लेकिन कुछ अरसे पहले इसका अपना कुछ स्टैंडर्ड था। कभी-कभी तो ये अपने वाले सरकारें हिला देते थे। समय के साथ इसका स्टैंडर्ड भले ही कम हुआ लेकिन इसकी उपयोगिता बढ़ गई। गुजरे कल की ही बात है मेरे शहर के नरेगाकर्मिर्यों ने स्थाई करने की मांग करते हुए कर डाला प्रदर्शन। अब, उन्हें कौन समझाए कि ठेके पर काम पाने वाला कर्मचारी जैसी उपमा से लाभान्वित नहीं हो सकता है। ठेके की अपनी शर्तें होती है और उन शर्तों में एक शर्त यह भी होती है कि वह राज का कारिंदा नहीं माना जाएगा। नरेगा का सुख भोग रहे मेरे एक मित्र को मैने यह बात बताने की जुर्रत कर डाली तो, वे बिफर पड़े और बोले, ठेके के समय भले ही हम कर्मचारी नहीं थे लेकिन आगे यह सुख लेने का प्रयास भी नहीं करें। हम भारतीय नागरिक है और हमें भी स्वतंत्रता का अधिकार है। उनके विचार जानकर मैं चुप। भला किसी के अधिकार का हनन मैं कैसे कर सकता हूं।सब कुछ साफ होने के बाद भी मन के कौने में एक बात रह-रहकर उठने का दुस्साहस किए बिना रहती कि सारे अधिकार इन धरना, प्रदर्शन के ठेकेदारों को ही क्यों मिलते हैं। ये भाई अपनी मांगे मनवाने के लिए उन करोड़ों लोगों के कितने ही अधिकारों को नेस्तनाबूत कर डालते हैं, जिनका दोष है तो इतना कि उन्हें जनता कहा जाता है। आरामदायक दफ्तरों में बैठे सरकार के नुमाइंदे कुछ न कुछ स्वार्थ के चलते ऐसे मुद्दों को हवा देते रहते हैं तो कर्मचारी नाम से अपनी पहचान रखने वाले उसमें घी डालने में पीछे नहीं रहते। दोनों की अपनी सैटिंग होती है लेकिन जनता जैसे जीव का आखिर क्या दोष है? खैर, यह मेरे से रुकने वाला नहीं, ऐसा होता आया है और होता रहेगा लेकिन...।

Saturday, August 8, 2009

न कोई रंग है जमाने में लव-आज कल के सिवा

अरविन्द शर्मा
हमारे देश में प्रेम की परंपरा अनादिकाल से चली आ रही है। उस वक्त समाज की एनओसी की आवश्यकता नहीं थी। क्योंकि प्रेम सर्वथा पवित्रता के साथ किया जाता था। लेकिन आजकल का लव रंग बिरंगा हो गया है। और जब से 'लव आज कल' के दर्शन किए है, 'आज और कल' के प्यार को समझने की उत्सुकता भी बढ़ गई है। अब तो सोचते हैं कि जमाने में मुहब्बत के रंग को छोड़ दें तो क्या कोई रंग बचा ही नहीं है। ऋषी कपूर और सेफअली खान के प्यार की फिल्मी कहानी तो कम से कम यहीं बयां कर रही है। समाज की एनओसी को तो अब के प्रेमियों ने अंगूठा दिखा दिया है। यकिन नहीं हो तो किसी भी बाग-बगीची और सार्वजनिक स्थान पर गौर फरमाकर देख लीजिए। बात रही प्रेमिका के अनापत्ति प्रमाणपत्र की तो उसमें भी दो प्रकार का फलसफा प्रचलित है। एक बिना एनओसी के तथा दूसरा बाकायदा प्रेमिका से एनओसी लेकर। इसकी बानगी भी लव पॉइंटी पर मिल जाएगी। कुछ मामलों में वन साइडेड गेम भी चल रहा है। ऐसे मामलों को हम और आप दीवाना या पागल कहकर टाल देते हैं।
इकरार नहीं होता इजहार नहीं होता।चाहकर तो किसी से प्यार नहीं होता।कई राहें गुजर हम-सफर मिलते हैं।हाथ मिलाने से ही कोई प्यार नहीं होता।।
पहले कई बार सुनते हैं कि फलां मजनूं ने प्रेम में विफल रहकर अपनी जान दे दी, लेकिन अब के मजनूं 'दिलवाले दुल्हनियां ले जाएंगे' की तर्ज पर अपनी नायिका को प्राप्त करके ही रहते हैं। मेरे कहने का आशय है कि पहले प्रेम 'नीट एंड क्लीन' था मगर इस जमाने के प्रेमी तो अगल ही रंग में भीगे हुए हैं। अब तो नायिकाओं की पहली मांग यही होती है। क्या कर सकते हैं? यह क्या कर सकते हैं, यह पहले सोचना भी पाप समझा जाता था। शायद यहीं कारण था कि ऋषी कपूर को काफी संघर्ष के बाद (लव आज कल) में अपना प्यार मिला।लव आज कल के बारे में काफी सोचा मगर जवाब अभी तक नहीं मिला था। लिहाजा मैंने प्रेम पुजारियों को पकड़ लिया। उन्होंने समझाया कि बच्चू, यह 'नादान' भी 'दीवाना' और 'पागल' होता है। जाओ और अपने प्रेम का बेखौफ इजहार कर दो। बातों को सुनकर हौंसला काफी मिला और एक कदम आगे बढ़ा दिया कि आज तो प्रेम का इजहार करके ही रहूंगा। लेकिन इसी बीच एक पत्रकार भाई ने फोन पर सूचना दी कि पहाड़ी पर एक कोने में प्रेम की पींगे भर रहे दो मजनूओं को पुलिसियां डंडे ने प्रेम की अच्छी परिभाषा सिखा दी है। फिर क्या था सरकारी चिकित्सालय के हड्डी वार्ड में पलास्टर बंधी टांगों का दर्शय आंखों के सामने आ गया।
हकीकत के करीब आने के बाद।समझा मोहब्बत दिल लगाने के बाद।मुझे गम अपना कुछ नहीं, उसका है,कौन चाहेगा उसे इतना मेरे जाने के बाद।
दीमाग में ख्याल आया कि यह तो बहुत सावधानी का खेल है, जिसमें बॉलर द्वारा फेंकी जाने वाली गेंद को भली प्रकार से समझना पड़ता है अन्यथा कोई आश्चर्य नहीं कि पहली ही बॉल पर क्लीन बोर्ड कर दिए जाओ। वैसे सच पूछो तो मेरा 'नीट एंड क्लीन' में ही ज्यादा विश्वास है। निगुर्ण, निराकारी प्रेम ही हमारे हृदय में बसा हुआ है।
प्रभु जो करता है, ठीक करता है। वही देने वाला है, देवे तो छप्पर फाड़कर दे दे अन्यथा छप्पर ज्यों का त्यों बना रहे। कबीर ने प्रेम को ढाई आखर कहा है और इसके पढऩे वाले को ज्ञानी बताया है। इस लिहाज से मैं भी उन ज्ञानियों में से हंू जो हर कार्य सोच-समझकर करते हैं। ये जो प्रेम है न, यह भी बड़े काम की चीज है। आप भी करिए, क्योंकि यह करने का काम है।

Monday, July 27, 2009

सरहद से आए खतों में आज भी जिंदा है कारगिल का युद्ध


अरविन्द शर्मा


वक्त को गुजरते वक्त ही कितना लगा है। कहने को कारगिल को दस साल बीत गए हैं लेकिन लगता नहीं कि युद्ध अभी खत्म हो गया है। समय के पहिए ने बेशक वक्त को पीछे धकेलने की तमाम कोशिशें की हों लेकिन राजस्थान के झुंझुनूं के भलोट गांव के शहीद नरेश कुमार जाट का एक जुलाई 99 को शहादत से पहले अपने दादा को लिखे खत को पढ़कर लगता है कि कारगिल का युद्ध अभी भी चल रहा है। हमने सहेजा है शेखावाटी के वीर सपूतों द्वारा कारगिल युद्ध के दौरान अपने परिजनों को लिखे शौर्य और गौरव के इन जीवंत दस्तावेजों को, जिन्हें पढ़कर लगता है कि कारगिल का युद्ध अभी खत्म नहीं हुआ है।



दादाजी लड़ाई
चल रही है लेकिन आप दिल छोटा मत करना। मैं पीछे नहीं हटूंगा। जरूरत पड़ी तो
71 की लड़ाई में पिताजी की तरह देश पर अपने प्राण न्यौछावर कर दूंगा।


युद्ध के
मैदान से झुंझुनूं भालोट के सिपाही नरेश कुमार जाट का 1 जुलाई 1999 को अपने दादा को
लिखा पत्र



10 अक्टूबर, 1999जनाब मेहरबान तायाजी अब्दुल हकीम खां, बाजी नजरू खां, चाचाजी असगर खां, अब्दुल मजीद खां, सलीम खुर्शीद, इमरान, शमसाद, सहीना, आसिफ, बबलू और सभी जान-पहचान वालों को दुआ-सलाम। मैं अल्लाह-ताला की दुआ से राजी-खुशी पहुंच गया हूं। आशा करता हूं आप भी अपने स्थान पर राजीखुशी होंगे जी। आगे समाचार यह है कि मैं कोशिश कर रहा हूं कि दिल्ली आ जाऊं। हो सका शायद पांच-छह दिन में पता लग जाएगा। कोई आने वाला होगा तो मैं उसके साथ पैसा जरूर भेज दूंगा। किसी प्रकार की चिंता-फिकर मत करना। समय-समय पर दवा लेती रहना। बच्चों का खयाल रखना। अच्छा खिलाना-पिलाना।लांस नायक हनीफ खान, राजपुताना राईफल्स वीरांगना- परवीन बानो, गावं-किडवाना, झुंझुनूं. 28 अगस्त,1996आदरणीय माताजीचरण स्पर्शमैं अपनी जगह राजीखुशी से काम करते हुए आपकी राजीखुशी श्रीभगवान से सदा नेक भला चाहता हूं। में अगले महिने ही छुट्टी आ रहा हूं। भड़ूंदा से भी राखी व पत्र आया था। सब राजीखुशी है। सुमित का एडमिशन कहां कराया है सो लिखना। सब ठीक है आप किसी प्रकार की चिंता नहीं करना। और क्या लिखूं आप खुद समझदार हैं।हवलदार मनीराम, रेजिमेंट-सीआरसीएफवीरांगना-रुकमणीदेवी, गांव-लांबा, झुंझुनूं19 जून, 1999पूजनीय माताजी, पिताजी को पांवाधोक बंचना। आज ही बहिन सुशीला के पास भी पत्र डाल रहा हूं, सो ध्यान रहे। मेरे बारे में आप कोई चिंता मत करना। 16 तारीख का अखबार आप जरूर पढ़ें। ये सभी शहीद मेरी ही युनिट के थे। अब ज्यादा खतरा नहीं है। तकरीबन शांति हो गई है। मैं सितंबर तक छुट्टी आ जाऊंगा, सो ध्यान रहे। पिताजी की तबीयत कैसी है। पत्र का जवाब जल्दी देना। मेरे लायक कोई सेवा हो तो लिखना। नायक सतवीरसिंह, 2 राजपूताना राईफल्सवीरांगना-मुकेशकंवर, गांव-रामपुरा, चूरू.3 जनवरी, 1999हवलदार रामसिंह शेखावतरेजिमेंट-19 गे्रनेडियर्सवीरांगना-राजकंवर गांव-चंवरा, झुंझुनूंप्रिय राज को उसके राम की तरफ से बहुत-बहुत प्यार। काकोसा, काकीसा, मासीसा, भाभीसा, भाई सा को चरण स्पर्श कहना। अन्नू, धापू, धीरू, जीतू व सभी बच्चों को मेरी तरफ से प्यार करना। तीनों लाडलों को पापा की तरफ से चुंबन। मैं यहां पर सकुशलपूर्वक रहकर आप सब के लिए मां भवानी से सदैव हाथ जोड़कर प्रार्थना करता हूं। मां आपको सदैव खुशहाल रखे। यही मेरी प्रार्थना है। आपका पत्र तो मिला नहीं है पर क्या करूं। तो सोचा पत्र लिख ही देता हूं। सर्दी का खास ध्यान रखना। अपना भी व बच्चों का भी। राज आपकी व बच्चों की याद बहुत आती है। राज आपको कसम तो शायद लगती नहीं। अपने लिए व बच्चों के लिए घी वगैरह नहीं लिया होगा। राज हर समय आपकी और बच्चों की याद सताती रहती है। किसी प्रकार की चिंता नहीं करना। अपना खास ध्यान रखना। धीरू, अन्नू को सुबह-शाम पढ़ाया करना। आराम से रहो, सर्दी का खास ध्यान रखना। आपके पत्र के इंतजार में। पत्र सभी समाचारों के साथ लिखना। अन्नु, धीरू, दीपक, जीतू को भी मेरा प्यार आपका अपना राम16 तारीख का अखबार आप जरूर पढ़ें। ये सभी शहीद मेरी ही युनिट के थे। अब ज्यादा खतरा नहीं है। तकरीबन शांति हो गई है। छुट्टी होते ही आऊंगा।Ó4 जुलाई, 1999सिपाही हवासिंहरेजिमेंट-17 जाट रेजिमेंटवीरांगना- मनोजदेवीगांव-बासमाना, झुंझुनूंआदरणीय भाई साहब, प्रमाणमैं भगवान से कुशलता के उपरांत कुशलता की कामना करता हूं। आगे समाचार यह है कि आपका लिखा पत्र पढ़ा। 24-6-99 का लिखा बाबूजी का पत्र मिला। मैं आप से सीधा बात नहीं कर सकता हूं। वैसे पहले वाले पत्र में मैंने टेलीफोन नंबर लिखा था। लेकिन उसका कोई फायदा नहीं है। मैं टेलीफोन कर सकूंगा तो राजू के पास कर दूंगा। मेरी ओर से किसी प्रकार की चिंता मत करना। शायद सवामणी कर दी होगी या कर देना। क्योंकि मुझे सवामणी का नाम सुनकर बहुत खुशी हुई थी। बस मेरे पास कोई और समाचार नहीं है। अब पत्र बंद करने की अनुमति चाहता हूं। पत्र में किसी प्रकार की गलती हो तो माफ करना। माताजी को पांव-धोक बचना। भाई साहब को मेरा प्रणाम और छोटों को मेरा प्यार कहना।23 जुलाई, 1999हवलदार शिवलालरेजिमेंट-ईएमईवीरांगना-इंद्रोदेवी गांव-जीवनीवास, झुंझुनूं.प्रिय भाई जयसिंह व महताबमैं मेरे स्थान पर राजी-खुशी हूं। मेरे साथियों सहित ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि आपको सपरिवार खुश रखे। मैंने फोन करने की कोशिश की थी लेकिन फोन नहीं मिला, तो अभी पत्र दे रहा हूं। 20 जुलाई को राजेंद्र ने ढाढ़ोत फोन किया था। सो एक बार मिला और तुरंत कट गया। थोड़ी ही बात हो पाई। पता चला कि बारिश हो गई है। लिखना कितनी हुई है। नीनाण किया या नहीं सो भी पत्र में लिखना। महताब किसी स्कूल में जाने लगा या नहीं। और कोई खास समाचार नहीं है, आपके पास हो तो लिखना। आप लोग किसी प्रकार की चिंता मत करना, मैं आराम से हूं। आप सब भाई-बहनों को राम-राम, बच्चों को प्यार, सभी पत्र पढऩे व सुनने वालों को भी राम-राम। पत्र का जवाब जल्दी देना। पत्र में कोई गलती हो तो माफ करना। पत्र के इंतजार में आपका बड़ा भाई।2 मार्च, 1999पूज्यनीय माताजी, पिताजीचरण स्पर्शमैं यहां कुशल रहते हुए आप सभी की कुशलता की कामना करता हूं। आगे समाचार यह है कि मैं यह दूसरा पत्र लिख रहा हूं। सो पत्र मिलते ही पत्र का जवाब शीघ्र देना। मैं अगले महिने की पांच तारीख को छुट्टी आने की कोशिश करूंगा, सो जानना। ताकि लावणी भी करवा सकूंगा व शादी भी हो जाएगी। मैं खूब मजे में हूं। यहां सर्दी तो बहुत ज्यादा है। बाकी सबकुछ ठीक है। आप लोगों को यह जानकर बहुत खुशी होगी कि मैंने शराब बिल्कुल छोड़ दी है। ग्वार बेच देना। दीपक व पवन की परीक्षा होने वाली है। सो उनको बताना कि दोनों खूब मन लगाकर पढ़ेंगे। छुट्टी आने के बाद वे जो कहेंगे वो ही चीज लाकर दे दूंगा। बाकी सभी पत्र पढऩे व सुनने वालों को मेरा राम-राम बंचना। बच्चों को प्यार। और सोनू को भी बहुत-बहुत प्यार। शेष कुशल से हूं। पत्र लिखने वाला आपकाहवलदार मनीराम, रेजिमेंट-जाट रेजिमेंटवीरांगना-मुन्नीदेवी, गांव-सीथल, झुंझुनूं.25 मार्च, 1998पूजनीय माताजी, पिताजीचरण स्पर्शमैं मरे स्थान पर भगवान की कृपा से राजीखुशी हूं। आशा करता हूं कि आप भी भगवान की कृपा से राजी-खुशी होंगे। आगे समाचार है कि खेती-बाड़ी कैसी है, सो लिखना। मैं दूसरा पत्र डाल रहा हूं। अभी तक आपका एक भी पत्र नहीं मिला है। सो क्या कारण है। माताजी, पिताजी, चाचाजी, दादीजी, बाबाजी, चाचाजी, चाचीजी, मौसियों और भाभीजी को चरण स्पर्श। सभी भाई-बहिनों व बेटियों को मेरा राम-राम बंचना। पत्र में गलती हो तो माफ करें। कम लिखे को ही ज्यादा समझना। राजपाल के पैर का क्या हाल है सो लिखना और रीना को मेरा प्यार मालूम होवेजी। आपके पत्र के इंतजार में, आपका अपना प्रिय पुत्र। सिपाही रणवीरसिंह, 17जाट रेजिमेंटवीरांगना- मनिषादेवी, गांव-मैनपुरा, झुंझुनूं. 12 जुलाई 1999प्रिय विमलाखुश रहो। मैं अपने स्थान पर कुशल हूं। आशा करता हूं कि आप भी ईश्वर की कृपा से वहां कुशल होंगे। समाचार यह है कि छुट्टी के बारे में तो आपको पता ही है सो इसके बारे में लिखने की जरूरत नहीं समझता। क्योंकि विकास का पत्र आया था। बाकी मेरी तरफ का कोई फिक्र मत करना। ज्यादा गर्मी में काम नहीं करना है। सुबह-शाम जितना होता है कर लेना। सिर्फ उधर ही ध्यान रखना। अभी मैं पूरी छुट्टी काटूंगा, जमा नहीं कराऊंगा। जब भी खुलेगी, मैं आ जाऊंगा। सो तकरीबन 12 महिने हैं, जिसमें पांच महिने घर और सात महिने ही घर से बाहर रहूंगा। खत आप खुद लिखना।सुबेदार मेजर रामपालसिंह, 34 राष्ट्रीय राईफल्स वीरांगना-विमलादेवी, गांव-काजला, झुंझुनूं

Sunday, July 19, 2009

हम तो भई जैसे है, वैसे रहेंगे

अरविन्द शर्मा
खुद बदले या नहीं बदले, दूसरों को बदलने की जिद हर किसी पर सवार है। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। कुछ लोग मुझे बदलने के लिए हर संभव कोशिश कर रहे हैं। मैं भी सोच-सोच कर परेशान हो रहा था। सोच ही रहा था कि एक दोस्त के यहां कम्प्यूटर पर लता मंगेशकर का गाना सुनने को मिल गया। गाना था 'हम तो भई जैसे है, वैसे रहेंगे, अब कोई खुश हो या खफा, हम नहीं बदलेंगे अपनी अदा' बस फिर क्या था, अब हमने भी लता दीदी की तरह जिद ठान ली है कि हम किसी के कहने पर नहीं बदलेंगे। अब आप सोच रहे होंगे कि हममें कोई बुरी आदत होगी, तभी तो लोग हमे बदलना चाह रहे हैं। अरे जनाब ऐसा कुछ नहीं है। न तो हममें कोई बुरी आदत है और न ही दूसरों के दिलो-दीमाग में बुरी आदत डालते हैं।
'हम दिल के शहजादे हैं, मर्जी के मालिक'
हमने तो तय कर लिया है, हमें बदलने वालों को हम बदल देंगे। अब हमने तो यहां तक तय कर लिया है कि मोबाइल में क्यों न इसी गाने की कॉलर ट्यून डलवा ली जाए। ताकि इन लोगों को याद आता ही रहे कि 'हम दिल के शहजादे हैं, मर्जी के मालिक, हम तो भई जैसे है, वैसे रहेंगेÓ। पता नहीं कि कुछ लोगों को यह गंभीर रोग क्यों लग जाता है कि उनके अंदर की बुराईयां उन्हें नजर नहीं आती, बस दूसरों को बदलना ही अपना कर्म समझते हैं। खासकर आपके ईद-गिर्द के लोगों को यह बीमारी सबसे ज्यादा लगी होती है। शायद दूसरों की तरक्की के कारण यह बीमारी पैदा होती होगी। अब आप ही बताईए कि क्या मुझे बदलना चाहिए या नहीं? वो भी तब, दूसरे जिद करके बैठ जाए?

Monday, July 13, 2009

क्या आपके पास है मंत्रीजी के सवाल का जवाब

अरविन्द शर्मा
राजस्थान के जल संसाधन मंत्री महिपालसिंह मदेरणा के सवाल का जवाब क्या आपके पास है? सवाल से पहले राज्य की स्थिति पर गौर फरमा लीजिए। अगर आबादी वर्तमान दर से बढ़ती रही तो वर्ष 2026 तक प्रदेश जल की पूर्णतया कमी वाला प्रदेश बन जाएगा। अंतरराष्ट्रीय मानदंडों के मुताबिक प्रति व्यक्ति दो हजार धन मीटर जल उपलब्ध होना चाहिए जबकि राजस्थान में केवल 660 घन मीटर ही उपलब्ध है।
अब मंत्री का सवाल भी सुनिए। विधानसभा में प्रतिपक्ष के बायकाट के बाद मंत्री मदरेणा ने कहा कि कोई फैक्टरी नहीं जो पानी पैदा किया जा सके? लेकिन मंत्रीजी शायद यह भूल गए है कि फैक्टरी तो नहीं मगर राज्य की जनता ने उन्हें इसलिए चुना है ताकि वह राज्य की सबसे गंभीर समस्या को दूर कर सके। लेकिन हालात कितने भयानक है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि आप किसी भी गांव-ढाणी में चले जाइए, लोग टैंकर या पानी माफियाओं के जाल में फंसे हुए है। अब सवाल यह उठता है कि जब पानी की कोई फैक्टरी नहीं है तो इन टैंकर व पानी माफियाओं के पास पानी कहां से आ रहा है? दूसरा सवाल जब राज्य में पानी नहीं है तो राज्य में पानी की बोतले और अन्य संसाधनों से पानी बेचने वालों के पास पानी कहां से आ रहा है? इन सवालों का जवाब शायद मंत्रीजी को आने वाले दिनों में देना होगा। यहां का आम आदमी और किसान पानी के लिए तरस रहा है तो पानी माफिया चांदी कूट रहे हैं। ऊपर से मंत्रीजी का यह जवाब कि उनके पास कोई फैक्टरी नहीं है बड़ा ही हास्यपद है। राज्य के हाल बेहद चिंताजनक है। वर्ष 1984 में राज्य में 12 खंड ही डार्क जोन थे जिनकी संख्या 2004 में बढ़कर 186 हो गई और वर्ष 2008 में यह संख्या 195 तक पहुंच गई। प्राथमिक तौर जो आंकड़ें उपलब्ध हुए हैं उनके मुताबिक कई जल भंडार अगले दस साल में खत्म हो जाएंगे। मौसम तंत्र में जिस तरह बदलाव हो रहा है उससे चिंता बढ़ती जा रही है। पिछले 15 साल से राज्य में कुल वर्षा की मात्रा में भी कमी आई है। प्रदेश में उपलब्ध जल-संसाधनों का 76.88 प्रतिशत उपयोग किया जा चुका है। उपलब्ध पानी में से 83 प्रतिशत उपयोग कृषि,11 प्रतिशत पेयजल और छह प्रतिशत औद्योगिक उपयोग में हो रहा है। प्रदेश में 18 लाख आबादी की बढ़ोतरी हो रही है। इससे पानी की कमी लगातार बढ़ती जाएगी। वर्तमान में पानी के लिए चल रही करीब 21 हजार करोड़ रुपए की योजनाओं के अतिरिक्त 29 हजार करोड़ की ओर जरूरत होगी। इस साल 14 जिलों में ही सामान्य वर्षा हुई है 19 जिले कम वर्षा वाले हैं।

Saturday, July 11, 2009

एक चॉकलेट में छिपी है बाल विवाह की सच्चाई

अरविन्द शर्मा
एक चॉकलेट, हां वोही चॉकलेट जो टेस्टी है और छोटे बच्चों को सबसे प्यारी लगती है। लेकिन जब आप यह सुनेंगे कि इसी चॉकलेट में बाल-विवाह का दर्द छिपा है तो आप जरूर चौंक जाएंगे। राजस्थान में होने वाले बाल-विवाह की 'वेदी' इस चॉकलेट पर सजती है। शुरू में मुझे इस पर यकीन नहीं हुआ मगर जब मैंने इन इलाकों और बाल-विवाह पर पड़ताल की तो यही सब हैरान-परेशान करने वाली जानकारी हासिल हुई। राजस्थान में 83 फीसदी बाल विवाह करवाने वाले ज्यादातर अभिभावक और रिश्तेदार नए कपड़ों, गाजे-बाजे और मिठाइयों का लालच देकर अपने बच्चों की शादियां करवा देते हैं। यह जानकारी नींद जरूर उड़ाती है, लेकिन हकीकत के बेहद करीब है। महिला व बाल विकास विभाग की ओर से पिछले बरस जब सर्वे कराया तो सामने आया था कि नाबालिग लड़के-लड़कियों को परंपराओं, गरीबी और माता-पिता व रिश्तेदारों के दबाव के कारण भी विवाह करने के लिए विवश होना पड़ता है। बड़ी बात तो यह है कि वहीं कम उम्र में विवाहित होने वाले इन बच्चों को विवाह का मतलब भी नहीं मालूम है। मैंने पिछले ब्लॉग 'अगले जन्म मोहे बीटिया न कीजोÓ में इसका अहम खुलासा भी किया है। महिला एवं बाल-विकास विभाग का यह सर्वेक्षण राजस्थान के टोंक व जयपुर के दस-दस गांव में कम उम्र में विवाह के बंधन में बंधे लोगों के माता-पिता, सास-ससुर, बड़े भाई-बहन और अन्य सगे संबंधियों से बातचीत पर आधारित है। इस बातचीत के आधार पर जो जानकारी हासिल हुई, उसने महिला एवं बाल विकास विभाग को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है। इन सबके अलावा 66 फीसदी के लिए विवाह का मतलब उत्सव मनाना है, 41 फीसदी के लिए आकर्षण का केंद्र बनना है, तो 25 फीसदी के लिए नए कपड़े पहनना है।

Friday, July 3, 2009

अगले जन्म मोहे बीटिया न कीजो!

अरविन्द शर्मा : लाइव
मैं सोच नहीं पा रहा हूं कि इस सवाल में दुआं नजर आ रही है या वो दर्द कहने की कोशिश की जा रही है जो हम और आप नहीं समझ पा रहे हैं। यह सवाल राजस्थान की उन बेटियों का है जो इस सवाल के साथ हर पल तड़प रही है। यह दर्द भी और किसी ने नहीं, उनके जन्मदाता ही दे रहे हैं। दर्द कितना बड़ा है, इसका अंदाजा कलर्स टीवी के बालिकावधु से लगाया जा सकता है।
तारिख एक जुलाई 2009। अपने कुछ सवालों के जवाब लिए मैं निकल चुका हूं, उन गांवों में जहां बेटियों को जिंदगीभर का दर्द दिया जा रहा है। दिल्ली की ममता संस्था जो बाल-विवाह की प्रथा के खिलाफ लड़ रही है, उसका दल भी मेरे साथ है। इटली के मार्को व एलेक्जेंड्रा ने भी अपने सवालों के जवाब तलाशने मेरे साथ निकल पड़े। कटराथल की ख्यालियों की ढाणी। यहां के कल्लुराम सैनी (बदला हुआ नाम) से मिलते ही मैंने पहला सवाल किया, आपने बेटी की शादी बचपन में क्यों कर दी? जो जवाब मुझे मिला, उसकी गूंज आज भी मेरे कानों को चीर रही है। जवाब था, साहब बेटियों को ज्यादा दिनों तक घर में रखना अशुभ होता है। शायद आपको यकीन न हो कि एक पिता ऐसा कैसे कह सकता है, मगर यह हकीकत है। कुछ परिवार ऐसे भी है जो गरीबी के कारण अपने बेटियों को उस अंधे कुएं में धकेल देते हैं, जहां रोटी है, कपड़ा है, सिर छुपाने के लिए एक छत है। बस कुछ नहीं है तो वो हंसता-खेलता बचपन, मां-बाप का प्यार, सहेलियों के साथ मटरगस्ती और वो सुनहरी यादें जो एक बेटी पिता के घर से विदा होते वक्त अपने साथ ले जाती है। यकीन नहीं है तो मेना (बदला हुआ नाम) की दर्दभरी दांस्ता जान लीजिए। यह आठ बरस की थी तब उसके पिता ने उसकी शादी कर दी, आज यह 21 बरस की हो चुकी है। अपने ससुराल में खुश है, मगर इसके सवालों के जवाब मैं और मेरा दल का कोई भी सदस्य नहीं दे पाया। मेना का सबसे बड़ा सवाल था, क्या मुझे हंसता-खेलता बचपन वापस लौटा सकते हो? मैं और मेरे साथी कटराथल, रामपुरा, कांवट, बंधावाला की ढाणी, दुल्लेपुरा व श्रीमाधोपुर के कुछ गांवों में 50 से अधिक परिवारों से मिले।
तस्वीर का दूसरा पहलु भी बड़ा ही खौफनाक है। महिला एवं बाल विकास विभाग के सर्वे के मुताबिक, राजस्थान में 80 फीसदी बाल-विवाह जबरन कराए जाते हैं। बच्चों को नए कपड़े, चॉकलेट का लालच देकर उन्हें उस डोर में बांध दिया जाता है, जिसके मायने क्या है जब तक उन्हें पता चलते हैं, तब तक जिंदगी की खुशियां 'राखÓ में बदल चुकी होती है। जरा सोचिए.............!

Friday, June 19, 2009

ड्रेकुला अनंत, ड्रेकुला कथा अनंता

अरविन्द शर्मा
अब सोचता हूं कि अच्छा हुआ बचपन में किसी ने परियों की तरह ड्रेकुला की कहानी नहीं सुनाई। आज ड्रेकुला होता तो वो भी शर्मसार हो जाता। राजस्थान के हिंडौनसिटी में बच्चों का खून निकालने का मामला सामने आने के बाद हर किसी के दिल की धड़कनें थमी हुई है। ड्रेकुला के दीमाक में भी कभी ऐसा घिनौने खेल की तस्वीर नहीं बनी होगी कि बच्चों का खून चूसने के लिए उन्हें कचौरी और ज्यूस का लालच दिया जाए। इन खूनी भेडिय़ों ने तो अपने भाई और मौसी के लड़के को भी नहीं बख्शा। आज डे्रकुला सच में होता तो इन लोगों को अपने चेला नहीं गुरू जरूर बनाता। मैंने जब यह खबर पहली बार सुनी तो मेरे बदन में सनसनी दौड़ी गई थी। खून के इस काले कारोबार ने प्राइवेट अस्पतालों पर भी सवालिया निशान लगा दिया है। सिंह अस्पताल के संचालक रघुवीर को पुलिस जब अदालत में पेशी के बाद थाने ले जा रही थी, तभी अदालत के बाहर खड़ी परिवार की महिलाएं रघुवीर से मिली और दुलार दिखाते हुए उसके चेहरे पर हाथ फेरा। इस दुलार को देख रघुवीर की आखें भई आई। लेकिन, रघुवीर जैसे इन लोगों का दिल उस वक्त क्यों नहीं पसीजा, जब नन्हें बच्चों के शरीर से वे खून की बूंदे निचोड़ रहे थे? इन महिलाओं की ममता, प्यार, दुलार और दया कहां गई थी, जब रघुवीर यह घिनोने काम कर रहा था?

Sunday, June 14, 2009

एक खबर, दस लाइन और तीन रिपोर्टर, तीनों ने किया क्या!

अरविन्द शर्मा
दिल्ली के एक बड़े अखबार का मुख्य पेज देखकर तो एक दिन मैं चौंक ही "या। बिजली परियोजना से जुड़ी यह खबर पांच-छह लाइन की थीं। खबर में दो-दो रिपोर्टर का नाम था। इसी तरह राजस्थान के एक अखबार में महज दस लाइन की खबर में तीन-तीन रिपोर्टर का नाम ल"ा हुआ था। अब भई कोई यह तो बताए कि चार-पांच लाइन वाली खबर में दो और दस लाइन की खबर में तीन रिपोर्टर ने किया क्या था? कहीं ऐसा तो नहीं है कि एक रिपोर्टर बीट में "या हो, दूसरे ने फोन किया हो और तीसरे ने खबर कम्प्यूटर पर कंपोज की हो? अब सवाल उठता है कि बायलाइन (रिपोर्टर का नाम ल"ाने) के लिए क्या कोई 'संविधानÓ है या नहीं? यह सवाल मुझसे कई पत्रकार कर चुके हैं, लेकिन मैं हर बार यह कहकर उनकी बात टाल देता हूं कि पत्रकारों को और मिलता क्या है, उनके पास ले देकर एक बायलाइन ही तो है। पिछले दिनों एक पत्रकार साथी ने भी मुझसे ई-मेल के जरिए यह सवाल पूछा था।
कभी-कभी तो ऐसी खबरें भी बायलाइन के साथ पढऩे को मिल जाती हैं, जिनको देखकर हस्सी है कि रूकती ही नहीं। पहले तो वह खबर ही रिपोर्टर ने क्यों लिखी और दूसरा लिख भी दी तो बायलाइन वाली इसमें बात क्या है। बायलाइन की बढ़ती भूख के कारण हमारे कुछ पत्रकारसाथी एजेंसी की खबरें भी उठाने से नहीं चुक रहे हैं। एजेंसी की वेबसाइट खोली, खबर उठाई और हाथ-पैर तोड़े और फिर से जोड़े, और लो तैयार हो "ई बायलाइन खबर। अब ताजा उदाहरण स्वाइनफ्लू का ही लीजिए। दिल्ली के ही कुछ अखबारों ने इस खबर को रिपोर्टर के नाम के साथ के साथ परोसा तो तो कुछ ने 'मेट्रो, न"र, हमारे संवाददाताÓ की डेटलाइन ल"ाकर। अ"र उन खबरों को "ौर से पढ़ा जाएं तो भाषा के अलावा कोई फर्क नजर नहीं आता है। आंकड़ें और अधिकारियों से बातचीत तो एक ही है। तो क्या बायलाइन के लिए भी कोई संविधान बनाए जाने की जरुरत है।