दिल के किसी न किसी कोने में भड़ास जरूर तिलमिला रही होगी। भड़ास की आग जरूर निकालिए, ताकि जलने वाले बच न पाएं। sarviind@gmail.com परभेजें।

Friday, June 19, 2009

ड्रेकुला अनंत, ड्रेकुला कथा अनंता

अरविन्द शर्मा
अब सोचता हूं कि अच्छा हुआ बचपन में किसी ने परियों की तरह ड्रेकुला की कहानी नहीं सुनाई। आज ड्रेकुला होता तो वो भी शर्मसार हो जाता। राजस्थान के हिंडौनसिटी में बच्चों का खून निकालने का मामला सामने आने के बाद हर किसी के दिल की धड़कनें थमी हुई है। ड्रेकुला के दीमाक में भी कभी ऐसा घिनौने खेल की तस्वीर नहीं बनी होगी कि बच्चों का खून चूसने के लिए उन्हें कचौरी और ज्यूस का लालच दिया जाए। इन खूनी भेडिय़ों ने तो अपने भाई और मौसी के लड़के को भी नहीं बख्शा। आज डे्रकुला सच में होता तो इन लोगों को अपने चेला नहीं गुरू जरूर बनाता। मैंने जब यह खबर पहली बार सुनी तो मेरे बदन में सनसनी दौड़ी गई थी। खून के इस काले कारोबार ने प्राइवेट अस्पतालों पर भी सवालिया निशान लगा दिया है। सिंह अस्पताल के संचालक रघुवीर को पुलिस जब अदालत में पेशी के बाद थाने ले जा रही थी, तभी अदालत के बाहर खड़ी परिवार की महिलाएं रघुवीर से मिली और दुलार दिखाते हुए उसके चेहरे पर हाथ फेरा। इस दुलार को देख रघुवीर की आखें भई आई। लेकिन, रघुवीर जैसे इन लोगों का दिल उस वक्त क्यों नहीं पसीजा, जब नन्हें बच्चों के शरीर से वे खून की बूंदे निचोड़ रहे थे? इन महिलाओं की ममता, प्यार, दुलार और दया कहां गई थी, जब रघुवीर यह घिनोने काम कर रहा था?

Sunday, June 14, 2009

एक खबर, दस लाइन और तीन रिपोर्टर, तीनों ने किया क्या!

अरविन्द शर्मा
दिल्ली के एक बड़े अखबार का मुख्य पेज देखकर तो एक दिन मैं चौंक ही "या। बिजली परियोजना से जुड़ी यह खबर पांच-छह लाइन की थीं। खबर में दो-दो रिपोर्टर का नाम था। इसी तरह राजस्थान के एक अखबार में महज दस लाइन की खबर में तीन-तीन रिपोर्टर का नाम ल"ा हुआ था। अब भई कोई यह तो बताए कि चार-पांच लाइन वाली खबर में दो और दस लाइन की खबर में तीन रिपोर्टर ने किया क्या था? कहीं ऐसा तो नहीं है कि एक रिपोर्टर बीट में "या हो, दूसरे ने फोन किया हो और तीसरे ने खबर कम्प्यूटर पर कंपोज की हो? अब सवाल उठता है कि बायलाइन (रिपोर्टर का नाम ल"ाने) के लिए क्या कोई 'संविधानÓ है या नहीं? यह सवाल मुझसे कई पत्रकार कर चुके हैं, लेकिन मैं हर बार यह कहकर उनकी बात टाल देता हूं कि पत्रकारों को और मिलता क्या है, उनके पास ले देकर एक बायलाइन ही तो है। पिछले दिनों एक पत्रकार साथी ने भी मुझसे ई-मेल के जरिए यह सवाल पूछा था।
कभी-कभी तो ऐसी खबरें भी बायलाइन के साथ पढऩे को मिल जाती हैं, जिनको देखकर हस्सी है कि रूकती ही नहीं। पहले तो वह खबर ही रिपोर्टर ने क्यों लिखी और दूसरा लिख भी दी तो बायलाइन वाली इसमें बात क्या है। बायलाइन की बढ़ती भूख के कारण हमारे कुछ पत्रकारसाथी एजेंसी की खबरें भी उठाने से नहीं चुक रहे हैं। एजेंसी की वेबसाइट खोली, खबर उठाई और हाथ-पैर तोड़े और फिर से जोड़े, और लो तैयार हो "ई बायलाइन खबर। अब ताजा उदाहरण स्वाइनफ्लू का ही लीजिए। दिल्ली के ही कुछ अखबारों ने इस खबर को रिपोर्टर के नाम के साथ के साथ परोसा तो तो कुछ ने 'मेट्रो, न"र, हमारे संवाददाताÓ की डेटलाइन ल"ाकर। अ"र उन खबरों को "ौर से पढ़ा जाएं तो भाषा के अलावा कोई फर्क नजर नहीं आता है। आंकड़ें और अधिकारियों से बातचीत तो एक ही है। तो क्या बायलाइन के लिए भी कोई संविधान बनाए जाने की जरुरत है।