दिल के किसी न किसी कोने में भड़ास जरूर तिलमिला रही होगी। भड़ास की आग जरूर निकालिए, ताकि जलने वाले बच न पाएं। sarviind@gmail.com परभेजें।

Monday, July 27, 2009

सरहद से आए खतों में आज भी जिंदा है कारगिल का युद्ध


अरविन्द शर्मा


वक्त को गुजरते वक्त ही कितना लगा है। कहने को कारगिल को दस साल बीत गए हैं लेकिन लगता नहीं कि युद्ध अभी खत्म हो गया है। समय के पहिए ने बेशक वक्त को पीछे धकेलने की तमाम कोशिशें की हों लेकिन राजस्थान के झुंझुनूं के भलोट गांव के शहीद नरेश कुमार जाट का एक जुलाई 99 को शहादत से पहले अपने दादा को लिखे खत को पढ़कर लगता है कि कारगिल का युद्ध अभी भी चल रहा है। हमने सहेजा है शेखावाटी के वीर सपूतों द्वारा कारगिल युद्ध के दौरान अपने परिजनों को लिखे शौर्य और गौरव के इन जीवंत दस्तावेजों को, जिन्हें पढ़कर लगता है कि कारगिल का युद्ध अभी खत्म नहीं हुआ है।



दादाजी लड़ाई
चल रही है लेकिन आप दिल छोटा मत करना। मैं पीछे नहीं हटूंगा। जरूरत पड़ी तो
71 की लड़ाई में पिताजी की तरह देश पर अपने प्राण न्यौछावर कर दूंगा।


युद्ध के
मैदान से झुंझुनूं भालोट के सिपाही नरेश कुमार जाट का 1 जुलाई 1999 को अपने दादा को
लिखा पत्र



10 अक्टूबर, 1999जनाब मेहरबान तायाजी अब्दुल हकीम खां, बाजी नजरू खां, चाचाजी असगर खां, अब्दुल मजीद खां, सलीम खुर्शीद, इमरान, शमसाद, सहीना, आसिफ, बबलू और सभी जान-पहचान वालों को दुआ-सलाम। मैं अल्लाह-ताला की दुआ से राजी-खुशी पहुंच गया हूं। आशा करता हूं आप भी अपने स्थान पर राजीखुशी होंगे जी। आगे समाचार यह है कि मैं कोशिश कर रहा हूं कि दिल्ली आ जाऊं। हो सका शायद पांच-छह दिन में पता लग जाएगा। कोई आने वाला होगा तो मैं उसके साथ पैसा जरूर भेज दूंगा। किसी प्रकार की चिंता-फिकर मत करना। समय-समय पर दवा लेती रहना। बच्चों का खयाल रखना। अच्छा खिलाना-पिलाना।लांस नायक हनीफ खान, राजपुताना राईफल्स वीरांगना- परवीन बानो, गावं-किडवाना, झुंझुनूं. 28 अगस्त,1996आदरणीय माताजीचरण स्पर्शमैं अपनी जगह राजीखुशी से काम करते हुए आपकी राजीखुशी श्रीभगवान से सदा नेक भला चाहता हूं। में अगले महिने ही छुट्टी आ रहा हूं। भड़ूंदा से भी राखी व पत्र आया था। सब राजीखुशी है। सुमित का एडमिशन कहां कराया है सो लिखना। सब ठीक है आप किसी प्रकार की चिंता नहीं करना। और क्या लिखूं आप खुद समझदार हैं।हवलदार मनीराम, रेजिमेंट-सीआरसीएफवीरांगना-रुकमणीदेवी, गांव-लांबा, झुंझुनूं19 जून, 1999पूजनीय माताजी, पिताजी को पांवाधोक बंचना। आज ही बहिन सुशीला के पास भी पत्र डाल रहा हूं, सो ध्यान रहे। मेरे बारे में आप कोई चिंता मत करना। 16 तारीख का अखबार आप जरूर पढ़ें। ये सभी शहीद मेरी ही युनिट के थे। अब ज्यादा खतरा नहीं है। तकरीबन शांति हो गई है। मैं सितंबर तक छुट्टी आ जाऊंगा, सो ध्यान रहे। पिताजी की तबीयत कैसी है। पत्र का जवाब जल्दी देना। मेरे लायक कोई सेवा हो तो लिखना। नायक सतवीरसिंह, 2 राजपूताना राईफल्सवीरांगना-मुकेशकंवर, गांव-रामपुरा, चूरू.3 जनवरी, 1999हवलदार रामसिंह शेखावतरेजिमेंट-19 गे्रनेडियर्सवीरांगना-राजकंवर गांव-चंवरा, झुंझुनूंप्रिय राज को उसके राम की तरफ से बहुत-बहुत प्यार। काकोसा, काकीसा, मासीसा, भाभीसा, भाई सा को चरण स्पर्श कहना। अन्नू, धापू, धीरू, जीतू व सभी बच्चों को मेरी तरफ से प्यार करना। तीनों लाडलों को पापा की तरफ से चुंबन। मैं यहां पर सकुशलपूर्वक रहकर आप सब के लिए मां भवानी से सदैव हाथ जोड़कर प्रार्थना करता हूं। मां आपको सदैव खुशहाल रखे। यही मेरी प्रार्थना है। आपका पत्र तो मिला नहीं है पर क्या करूं। तो सोचा पत्र लिख ही देता हूं। सर्दी का खास ध्यान रखना। अपना भी व बच्चों का भी। राज आपकी व बच्चों की याद बहुत आती है। राज आपको कसम तो शायद लगती नहीं। अपने लिए व बच्चों के लिए घी वगैरह नहीं लिया होगा। राज हर समय आपकी और बच्चों की याद सताती रहती है। किसी प्रकार की चिंता नहीं करना। अपना खास ध्यान रखना। धीरू, अन्नू को सुबह-शाम पढ़ाया करना। आराम से रहो, सर्दी का खास ध्यान रखना। आपके पत्र के इंतजार में। पत्र सभी समाचारों के साथ लिखना। अन्नु, धीरू, दीपक, जीतू को भी मेरा प्यार आपका अपना राम16 तारीख का अखबार आप जरूर पढ़ें। ये सभी शहीद मेरी ही युनिट के थे। अब ज्यादा खतरा नहीं है। तकरीबन शांति हो गई है। छुट्टी होते ही आऊंगा।Ó4 जुलाई, 1999सिपाही हवासिंहरेजिमेंट-17 जाट रेजिमेंटवीरांगना- मनोजदेवीगांव-बासमाना, झुंझुनूंआदरणीय भाई साहब, प्रमाणमैं भगवान से कुशलता के उपरांत कुशलता की कामना करता हूं। आगे समाचार यह है कि आपका लिखा पत्र पढ़ा। 24-6-99 का लिखा बाबूजी का पत्र मिला। मैं आप से सीधा बात नहीं कर सकता हूं। वैसे पहले वाले पत्र में मैंने टेलीफोन नंबर लिखा था। लेकिन उसका कोई फायदा नहीं है। मैं टेलीफोन कर सकूंगा तो राजू के पास कर दूंगा। मेरी ओर से किसी प्रकार की चिंता मत करना। शायद सवामणी कर दी होगी या कर देना। क्योंकि मुझे सवामणी का नाम सुनकर बहुत खुशी हुई थी। बस मेरे पास कोई और समाचार नहीं है। अब पत्र बंद करने की अनुमति चाहता हूं। पत्र में किसी प्रकार की गलती हो तो माफ करना। माताजी को पांव-धोक बचना। भाई साहब को मेरा प्रणाम और छोटों को मेरा प्यार कहना।23 जुलाई, 1999हवलदार शिवलालरेजिमेंट-ईएमईवीरांगना-इंद्रोदेवी गांव-जीवनीवास, झुंझुनूं.प्रिय भाई जयसिंह व महताबमैं मेरे स्थान पर राजी-खुशी हूं। मेरे साथियों सहित ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि आपको सपरिवार खुश रखे। मैंने फोन करने की कोशिश की थी लेकिन फोन नहीं मिला, तो अभी पत्र दे रहा हूं। 20 जुलाई को राजेंद्र ने ढाढ़ोत फोन किया था। सो एक बार मिला और तुरंत कट गया। थोड़ी ही बात हो पाई। पता चला कि बारिश हो गई है। लिखना कितनी हुई है। नीनाण किया या नहीं सो भी पत्र में लिखना। महताब किसी स्कूल में जाने लगा या नहीं। और कोई खास समाचार नहीं है, आपके पास हो तो लिखना। आप लोग किसी प्रकार की चिंता मत करना, मैं आराम से हूं। आप सब भाई-बहनों को राम-राम, बच्चों को प्यार, सभी पत्र पढऩे व सुनने वालों को भी राम-राम। पत्र का जवाब जल्दी देना। पत्र में कोई गलती हो तो माफ करना। पत्र के इंतजार में आपका बड़ा भाई।2 मार्च, 1999पूज्यनीय माताजी, पिताजीचरण स्पर्शमैं यहां कुशल रहते हुए आप सभी की कुशलता की कामना करता हूं। आगे समाचार यह है कि मैं यह दूसरा पत्र लिख रहा हूं। सो पत्र मिलते ही पत्र का जवाब शीघ्र देना। मैं अगले महिने की पांच तारीख को छुट्टी आने की कोशिश करूंगा, सो जानना। ताकि लावणी भी करवा सकूंगा व शादी भी हो जाएगी। मैं खूब मजे में हूं। यहां सर्दी तो बहुत ज्यादा है। बाकी सबकुछ ठीक है। आप लोगों को यह जानकर बहुत खुशी होगी कि मैंने शराब बिल्कुल छोड़ दी है। ग्वार बेच देना। दीपक व पवन की परीक्षा होने वाली है। सो उनको बताना कि दोनों खूब मन लगाकर पढ़ेंगे। छुट्टी आने के बाद वे जो कहेंगे वो ही चीज लाकर दे दूंगा। बाकी सभी पत्र पढऩे व सुनने वालों को मेरा राम-राम बंचना। बच्चों को प्यार। और सोनू को भी बहुत-बहुत प्यार। शेष कुशल से हूं। पत्र लिखने वाला आपकाहवलदार मनीराम, रेजिमेंट-जाट रेजिमेंटवीरांगना-मुन्नीदेवी, गांव-सीथल, झुंझुनूं.25 मार्च, 1998पूजनीय माताजी, पिताजीचरण स्पर्शमैं मरे स्थान पर भगवान की कृपा से राजीखुशी हूं। आशा करता हूं कि आप भी भगवान की कृपा से राजी-खुशी होंगे। आगे समाचार है कि खेती-बाड़ी कैसी है, सो लिखना। मैं दूसरा पत्र डाल रहा हूं। अभी तक आपका एक भी पत्र नहीं मिला है। सो क्या कारण है। माताजी, पिताजी, चाचाजी, दादीजी, बाबाजी, चाचाजी, चाचीजी, मौसियों और भाभीजी को चरण स्पर्श। सभी भाई-बहिनों व बेटियों को मेरा राम-राम बंचना। पत्र में गलती हो तो माफ करें। कम लिखे को ही ज्यादा समझना। राजपाल के पैर का क्या हाल है सो लिखना और रीना को मेरा प्यार मालूम होवेजी। आपके पत्र के इंतजार में, आपका अपना प्रिय पुत्र। सिपाही रणवीरसिंह, 17जाट रेजिमेंटवीरांगना- मनिषादेवी, गांव-मैनपुरा, झुंझुनूं. 12 जुलाई 1999प्रिय विमलाखुश रहो। मैं अपने स्थान पर कुशल हूं। आशा करता हूं कि आप भी ईश्वर की कृपा से वहां कुशल होंगे। समाचार यह है कि छुट्टी के बारे में तो आपको पता ही है सो इसके बारे में लिखने की जरूरत नहीं समझता। क्योंकि विकास का पत्र आया था। बाकी मेरी तरफ का कोई फिक्र मत करना। ज्यादा गर्मी में काम नहीं करना है। सुबह-शाम जितना होता है कर लेना। सिर्फ उधर ही ध्यान रखना। अभी मैं पूरी छुट्टी काटूंगा, जमा नहीं कराऊंगा। जब भी खुलेगी, मैं आ जाऊंगा। सो तकरीबन 12 महिने हैं, जिसमें पांच महिने घर और सात महिने ही घर से बाहर रहूंगा। खत आप खुद लिखना।सुबेदार मेजर रामपालसिंह, 34 राष्ट्रीय राईफल्स वीरांगना-विमलादेवी, गांव-काजला, झुंझुनूं

Sunday, July 19, 2009

हम तो भई जैसे है, वैसे रहेंगे

अरविन्द शर्मा
खुद बदले या नहीं बदले, दूसरों को बदलने की जिद हर किसी पर सवार है। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। कुछ लोग मुझे बदलने के लिए हर संभव कोशिश कर रहे हैं। मैं भी सोच-सोच कर परेशान हो रहा था। सोच ही रहा था कि एक दोस्त के यहां कम्प्यूटर पर लता मंगेशकर का गाना सुनने को मिल गया। गाना था 'हम तो भई जैसे है, वैसे रहेंगे, अब कोई खुश हो या खफा, हम नहीं बदलेंगे अपनी अदा' बस फिर क्या था, अब हमने भी लता दीदी की तरह जिद ठान ली है कि हम किसी के कहने पर नहीं बदलेंगे। अब आप सोच रहे होंगे कि हममें कोई बुरी आदत होगी, तभी तो लोग हमे बदलना चाह रहे हैं। अरे जनाब ऐसा कुछ नहीं है। न तो हममें कोई बुरी आदत है और न ही दूसरों के दिलो-दीमाग में बुरी आदत डालते हैं।
'हम दिल के शहजादे हैं, मर्जी के मालिक'
हमने तो तय कर लिया है, हमें बदलने वालों को हम बदल देंगे। अब हमने तो यहां तक तय कर लिया है कि मोबाइल में क्यों न इसी गाने की कॉलर ट्यून डलवा ली जाए। ताकि इन लोगों को याद आता ही रहे कि 'हम दिल के शहजादे हैं, मर्जी के मालिक, हम तो भई जैसे है, वैसे रहेंगेÓ। पता नहीं कि कुछ लोगों को यह गंभीर रोग क्यों लग जाता है कि उनके अंदर की बुराईयां उन्हें नजर नहीं आती, बस दूसरों को बदलना ही अपना कर्म समझते हैं। खासकर आपके ईद-गिर्द के लोगों को यह बीमारी सबसे ज्यादा लगी होती है। शायद दूसरों की तरक्की के कारण यह बीमारी पैदा होती होगी। अब आप ही बताईए कि क्या मुझे बदलना चाहिए या नहीं? वो भी तब, दूसरे जिद करके बैठ जाए?

Monday, July 13, 2009

क्या आपके पास है मंत्रीजी के सवाल का जवाब

अरविन्द शर्मा
राजस्थान के जल संसाधन मंत्री महिपालसिंह मदेरणा के सवाल का जवाब क्या आपके पास है? सवाल से पहले राज्य की स्थिति पर गौर फरमा लीजिए। अगर आबादी वर्तमान दर से बढ़ती रही तो वर्ष 2026 तक प्रदेश जल की पूर्णतया कमी वाला प्रदेश बन जाएगा। अंतरराष्ट्रीय मानदंडों के मुताबिक प्रति व्यक्ति दो हजार धन मीटर जल उपलब्ध होना चाहिए जबकि राजस्थान में केवल 660 घन मीटर ही उपलब्ध है।
अब मंत्री का सवाल भी सुनिए। विधानसभा में प्रतिपक्ष के बायकाट के बाद मंत्री मदरेणा ने कहा कि कोई फैक्टरी नहीं जो पानी पैदा किया जा सके? लेकिन मंत्रीजी शायद यह भूल गए है कि फैक्टरी तो नहीं मगर राज्य की जनता ने उन्हें इसलिए चुना है ताकि वह राज्य की सबसे गंभीर समस्या को दूर कर सके। लेकिन हालात कितने भयानक है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि आप किसी भी गांव-ढाणी में चले जाइए, लोग टैंकर या पानी माफियाओं के जाल में फंसे हुए है। अब सवाल यह उठता है कि जब पानी की कोई फैक्टरी नहीं है तो इन टैंकर व पानी माफियाओं के पास पानी कहां से आ रहा है? दूसरा सवाल जब राज्य में पानी नहीं है तो राज्य में पानी की बोतले और अन्य संसाधनों से पानी बेचने वालों के पास पानी कहां से आ रहा है? इन सवालों का जवाब शायद मंत्रीजी को आने वाले दिनों में देना होगा। यहां का आम आदमी और किसान पानी के लिए तरस रहा है तो पानी माफिया चांदी कूट रहे हैं। ऊपर से मंत्रीजी का यह जवाब कि उनके पास कोई फैक्टरी नहीं है बड़ा ही हास्यपद है। राज्य के हाल बेहद चिंताजनक है। वर्ष 1984 में राज्य में 12 खंड ही डार्क जोन थे जिनकी संख्या 2004 में बढ़कर 186 हो गई और वर्ष 2008 में यह संख्या 195 तक पहुंच गई। प्राथमिक तौर जो आंकड़ें उपलब्ध हुए हैं उनके मुताबिक कई जल भंडार अगले दस साल में खत्म हो जाएंगे। मौसम तंत्र में जिस तरह बदलाव हो रहा है उससे चिंता बढ़ती जा रही है। पिछले 15 साल से राज्य में कुल वर्षा की मात्रा में भी कमी आई है। प्रदेश में उपलब्ध जल-संसाधनों का 76.88 प्रतिशत उपयोग किया जा चुका है। उपलब्ध पानी में से 83 प्रतिशत उपयोग कृषि,11 प्रतिशत पेयजल और छह प्रतिशत औद्योगिक उपयोग में हो रहा है। प्रदेश में 18 लाख आबादी की बढ़ोतरी हो रही है। इससे पानी की कमी लगातार बढ़ती जाएगी। वर्तमान में पानी के लिए चल रही करीब 21 हजार करोड़ रुपए की योजनाओं के अतिरिक्त 29 हजार करोड़ की ओर जरूरत होगी। इस साल 14 जिलों में ही सामान्य वर्षा हुई है 19 जिले कम वर्षा वाले हैं।

Saturday, July 11, 2009

एक चॉकलेट में छिपी है बाल विवाह की सच्चाई

अरविन्द शर्मा
एक चॉकलेट, हां वोही चॉकलेट जो टेस्टी है और छोटे बच्चों को सबसे प्यारी लगती है। लेकिन जब आप यह सुनेंगे कि इसी चॉकलेट में बाल-विवाह का दर्द छिपा है तो आप जरूर चौंक जाएंगे। राजस्थान में होने वाले बाल-विवाह की 'वेदी' इस चॉकलेट पर सजती है। शुरू में मुझे इस पर यकीन नहीं हुआ मगर जब मैंने इन इलाकों और बाल-विवाह पर पड़ताल की तो यही सब हैरान-परेशान करने वाली जानकारी हासिल हुई। राजस्थान में 83 फीसदी बाल विवाह करवाने वाले ज्यादातर अभिभावक और रिश्तेदार नए कपड़ों, गाजे-बाजे और मिठाइयों का लालच देकर अपने बच्चों की शादियां करवा देते हैं। यह जानकारी नींद जरूर उड़ाती है, लेकिन हकीकत के बेहद करीब है। महिला व बाल विकास विभाग की ओर से पिछले बरस जब सर्वे कराया तो सामने आया था कि नाबालिग लड़के-लड़कियों को परंपराओं, गरीबी और माता-पिता व रिश्तेदारों के दबाव के कारण भी विवाह करने के लिए विवश होना पड़ता है। बड़ी बात तो यह है कि वहीं कम उम्र में विवाहित होने वाले इन बच्चों को विवाह का मतलब भी नहीं मालूम है। मैंने पिछले ब्लॉग 'अगले जन्म मोहे बीटिया न कीजोÓ में इसका अहम खुलासा भी किया है। महिला एवं बाल-विकास विभाग का यह सर्वेक्षण राजस्थान के टोंक व जयपुर के दस-दस गांव में कम उम्र में विवाह के बंधन में बंधे लोगों के माता-पिता, सास-ससुर, बड़े भाई-बहन और अन्य सगे संबंधियों से बातचीत पर आधारित है। इस बातचीत के आधार पर जो जानकारी हासिल हुई, उसने महिला एवं बाल विकास विभाग को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है। इन सबके अलावा 66 फीसदी के लिए विवाह का मतलब उत्सव मनाना है, 41 फीसदी के लिए आकर्षण का केंद्र बनना है, तो 25 फीसदी के लिए नए कपड़े पहनना है।

Friday, July 3, 2009

अगले जन्म मोहे बीटिया न कीजो!

अरविन्द शर्मा : लाइव
मैं सोच नहीं पा रहा हूं कि इस सवाल में दुआं नजर आ रही है या वो दर्द कहने की कोशिश की जा रही है जो हम और आप नहीं समझ पा रहे हैं। यह सवाल राजस्थान की उन बेटियों का है जो इस सवाल के साथ हर पल तड़प रही है। यह दर्द भी और किसी ने नहीं, उनके जन्मदाता ही दे रहे हैं। दर्द कितना बड़ा है, इसका अंदाजा कलर्स टीवी के बालिकावधु से लगाया जा सकता है।
तारिख एक जुलाई 2009। अपने कुछ सवालों के जवाब लिए मैं निकल चुका हूं, उन गांवों में जहां बेटियों को जिंदगीभर का दर्द दिया जा रहा है। दिल्ली की ममता संस्था जो बाल-विवाह की प्रथा के खिलाफ लड़ रही है, उसका दल भी मेरे साथ है। इटली के मार्को व एलेक्जेंड्रा ने भी अपने सवालों के जवाब तलाशने मेरे साथ निकल पड़े। कटराथल की ख्यालियों की ढाणी। यहां के कल्लुराम सैनी (बदला हुआ नाम) से मिलते ही मैंने पहला सवाल किया, आपने बेटी की शादी बचपन में क्यों कर दी? जो जवाब मुझे मिला, उसकी गूंज आज भी मेरे कानों को चीर रही है। जवाब था, साहब बेटियों को ज्यादा दिनों तक घर में रखना अशुभ होता है। शायद आपको यकीन न हो कि एक पिता ऐसा कैसे कह सकता है, मगर यह हकीकत है। कुछ परिवार ऐसे भी है जो गरीबी के कारण अपने बेटियों को उस अंधे कुएं में धकेल देते हैं, जहां रोटी है, कपड़ा है, सिर छुपाने के लिए एक छत है। बस कुछ नहीं है तो वो हंसता-खेलता बचपन, मां-बाप का प्यार, सहेलियों के साथ मटरगस्ती और वो सुनहरी यादें जो एक बेटी पिता के घर से विदा होते वक्त अपने साथ ले जाती है। यकीन नहीं है तो मेना (बदला हुआ नाम) की दर्दभरी दांस्ता जान लीजिए। यह आठ बरस की थी तब उसके पिता ने उसकी शादी कर दी, आज यह 21 बरस की हो चुकी है। अपने ससुराल में खुश है, मगर इसके सवालों के जवाब मैं और मेरा दल का कोई भी सदस्य नहीं दे पाया। मेना का सबसे बड़ा सवाल था, क्या मुझे हंसता-खेलता बचपन वापस लौटा सकते हो? मैं और मेरे साथी कटराथल, रामपुरा, कांवट, बंधावाला की ढाणी, दुल्लेपुरा व श्रीमाधोपुर के कुछ गांवों में 50 से अधिक परिवारों से मिले।
तस्वीर का दूसरा पहलु भी बड़ा ही खौफनाक है। महिला एवं बाल विकास विभाग के सर्वे के मुताबिक, राजस्थान में 80 फीसदी बाल-विवाह जबरन कराए जाते हैं। बच्चों को नए कपड़े, चॉकलेट का लालच देकर उन्हें उस डोर में बांध दिया जाता है, जिसके मायने क्या है जब तक उन्हें पता चलते हैं, तब तक जिंदगी की खुशियां 'राखÓ में बदल चुकी होती है। जरा सोचिए.............!