दिल के किसी न किसी कोने में भड़ास जरूर तिलमिला रही होगी। भड़ास की आग जरूर निकालिए, ताकि जलने वाले बच न पाएं। sarviind@gmail.com परभेजें।

Friday, August 21, 2009

गणेशजी के अपमान के लिए दोषी कौन?

यह सवाल मेरे जहेन में काफी दिनों से कोंद रहा है कि क्या प्रथम आराध्य देव श्रीगणेश के अपमान के लिए दोषी आप है? इसका जवाब शायद 'हांÓ है। हर बार गणेश चतुर्थी पर इसी तरह गणेशजी का पमान होता आया है और इस बार भी हम और आप प्रथम पुज्य गणेश भगवान का अपमान करने जा रहे हैं। और वो भी तब जब हम गणेश चतुर्थी पर बड़े श्रद्धाभाव से गणेश को पूजते हैं और मन्नते मांगते हैं। यदि आप यह नहीं चाहते हैं कि आपके हाथों गणेश का अपमान हो तो आईए हमारीमुहिम में शामिल हो जाइए। कौन है इस अपमान के लिए जिम्मेदार है? कैसे इस अपमान को रोका जा सकता है? हमें बताइए। इस गणेश चतुर्थी पर हम और आप मिलकर एक नई जोत जला सकते हैं भक्तिभाव की। हमारी मुहिम में शामिल होने के लिए कमेंट कीजिए। या फिर ईमेल के जरिए अपने विचार भेजे : sarviind@gmail.com


Friday, August 14, 2009

आज 'सूखा दिवस': फिर भी हम आजाद है!

अरविन्द शर्मा
आजादी के मौके पर आज हमें एक तांगे वाले की कहानी याद आ गई। एक तांगे वाले के तांगे में लीडर लोग बैठकर घर से मयखाने जाते थे। आते वक्त वे बतियाते कि आजादी मिलने के बाद सब कुछ बदल जाएगा। गरीब गरीब न रहेगा। गरीबी-अमीरी की खाई पट जाएगी। सबको बोलने की आजादी होगी। जमाखोरों का धन लूटकर गरीबों में बांट दिया जाएगा। लीडरों की बात पर उसे यकीन हो गया। आजादी के दिन उसे लगा कि अब तो मैं आजाद हूं सो चौराहे पर जाकर बढ़ती महंगाई के खिलाफ बोलने लगा- यह कैसा राज। जहां मुझे और मेरे घोड़े को दो मुट्ठी दाल भी न मिले। राज के सिपाही ने यह सुन लिया। वह तांगे वाले के पास गया और उसके दो डंडे लगाकर बोला-अबे ज्यादा चिल्प-पों मत कर। चल भाग यहां से। तांगे वाले को समझ नहीं आया कि यह कैसी आजादी, जहां सच बोलने पर भी डंडे पड़ते हों। यह तो एक कहानी है। लेकिन सवाल आज भी कायम है कि क्या हम आजाद है? विश्व बैंक के मुताबिक, 75 फीसदी भारतीय दो डॉलर प्रतिदिन से कम में जीवन यापन कर रहे हैं। करोड़ों लोग भूखे पेट सोने को मजबूर है। फिर भी हम आजाद है। आम आदमी महंगाई के पंजों में जकड़ा हुआ है और सरकार आंखें मुंदे बैठी है। फिर भी हम आजाद है। आपके जहेन में स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संख्या पर राष्ट्रपति का बयान भी ताजा होगा कि शासन भ्रष्टाचार में फंसता जा रहा है। यह सच भी है। फिर भी हम आजाद है। याद कीजिए स्वतंत्रता दिवस का वो दिन, जब पूरा देश आजादी की खुशियां मना रहा था और गांधीजी एक कमरे में अंधेरा किए आंसू बहा रहे थे। आखिर क्यों? संसद पर आतंकी हमले की घटना, मुंबई पर 26/11 का हमला, मुंबई में सिरियल ब्लास्ट और न जाने कितने हमले। फिर भी हम आजाद है। वो घटनाएं भी याद कीजिए, कई राज्यों में महिलाओं को निर्वस्त्र करके सरेआम पीटा गया। वो दिन भी याद कीजिए, जब गांधीजी की पुरानी चीजें विदेशों में नीलाम हो रही थी, लेकिन सरकार चुप थी। लेकिन फिर भी हम आजाद है।जिन लोगों ने आजादी के लिए बलिदान किया उन्हीं की औलाद सरकारी खजाना लूटने में जुट गई। उनमें और डाकुओं में फर्क सिर्फ इतना था कि डाकू जान जोखिम में डालकर लूट-खसोट करते थे और ये लोग गरीबों के आंसू पोंछने के नाम पर खजानों से माल सूंतते रहे। देखते-देखते नेताओं की तोंद के घेरे में अप्रत्याशित इजाफा हो गया। जो कल तक हाथ पसारे फिरते थे वे धन्नासेठों के बाप बन गए और आम आदमी का शरीर हड्डियों में तब्दील होता गया। लेकिन फिर भी हम आजाद है.......।

मेरी पड़ोसन खाय दही, मोसे कैसे जाय सही

अरविन्द शर्मा
हमारे यहां यह कहावत लंबे समय से चली आ रही है, 'मेरी पड़ोसन खाय दही, मोसे कैसे जाय सही'। ऐसी खबर पिछले दिनों मैंने अखबार में पढ़ी तो बचपन से चौबीस तक की जिंदगी सिनेमा की रील की तरह आंखों के सामने से गुजर गई। दिमाग ने कहा कि नहीं इस बात पर यकीन करना बेमानी है, लेकिन क्या करें यह कमबख्त दिल है की मानता ही नहीं, चाहे कोई कितना भी समझाए। दिल का भी क्या कहना, इसी दौरान कोई खुबसूरत बला आंखों के सामने से गुजरी तो दिल बाबू की ताक-झांक फिर से शुरू हो गई। अगर पड़ोस चैन से रोटी खा रहा है तो वह भी हमें सहन नहीं होता। मेरे पड़ोसी और कुछ साथियों को भी रोटी नहीं पचती है, जब तक हमारी बुराई नहीं कर दें। अब अपने पड़ोसियों को ही देख लो। भारत में क्या चल रहा है? इसकी प्रतिक्रिया अपने देश से ज्यादा पाकिस्तान में होती है। और सीमापार की खबरों ने के लिए भी हम मचलते रहते हैं। ताकना भी कई तरह का होता है। कुछ लोग चोरी-चोरी ताकते हैं। सीधे ताकने की हिम्मत नहीं होती। यह ताका-झांकी किशोरावस्था में चलती है। देखने वाले ऐसे ताकते हैं जैसे आंखों से काजल चुरा रहे हों। युवावस्था में आशिक की नजरें सीधी होने लगती है। पर यहां की कुछ शर्मोहया बची रहती है। दिल में धुकधुकी सी रहती है कि कहीं जिसे ताका जा रहा है वह रिजेक्ट न कर दे। अधेड़ावस्था तक ताका-झांकी में बेशर्मी छा जाती है। लेकिन यहां भी कुछ मानते नहीं है। कुछ लोग बागों में सिर्फ इसलिए घूमने जाते हैं कि वहां खिलती कलियों और फूलों को निहार सकें। अपने कुछ मित्र लोगों को भी यह आदत है। वैसे ताकने-झांकने के लिए बुढ़ापा काफी मुफिद होता है। आदमी उल्लू की मानिद ताकता रहता है पर कोई उस पर ध्यान नहीं देता। बाज शख्स तो सौंदर्य का नजारों से ही नहीं कदमों से पीछा करना शुरू कर देते हैं। ऐसे लोगों को सरे बाजार पिटते देखा गया है। बहरहाल हमारी तो युवाओं को यही सलाह है कि गति से प्रथम सुरक्षा रखें। तेज नजरों और तेज कदमों से दौडऩे की अपेक्षा हौले-हौले चलें। तेज दौडऩे वाले ही ठोकर खाकर गिरते हैं। बेहतर तो यही है कि इस ताका-झांकी की आदत से बाज आ लिया जाए। जिंदगी में एक बरस कम नहीं होता।

Thursday, August 13, 2009

ऐसा होता आया है, होता रहेगा

कैलाश राव
धरना, ज्ञापन और प्रदर्शन। अपने लोकतंत्र में यह तीनों ऐसे पुख्ता हथियार हैं कि इनसे हर तरह की लड़ाई लड़ी जा सकती है। चाहे वह नाजायज ही क्यों न हों। इस पर हमारे देश के कर्मठ कर्मचारियों का एकाधिकार है। जब चाहे तब ज्ञापन, इससे बात नहीं बनी तो प्रदर्शन और फिर भी मामला नहीं बैठे तो धरना। इससे आगे भी व्यवस्थाएं हैं, जैसे पुतला दहन, आमरण अनशन, भूख हड़ताल आदि-आदि।यूं तो इस अचूक शस्त्र का इस्तेमाल भाई लोग बरसों से करते आ रहे हैं लेकिन कुछ अरसे पहले इसका अपना कुछ स्टैंडर्ड था। कभी-कभी तो ये अपने वाले सरकारें हिला देते थे। समय के साथ इसका स्टैंडर्ड भले ही कम हुआ लेकिन इसकी उपयोगिता बढ़ गई। गुजरे कल की ही बात है मेरे शहर के नरेगाकर्मिर्यों ने स्थाई करने की मांग करते हुए कर डाला प्रदर्शन। अब, उन्हें कौन समझाए कि ठेके पर काम पाने वाला कर्मचारी जैसी उपमा से लाभान्वित नहीं हो सकता है। ठेके की अपनी शर्तें होती है और उन शर्तों में एक शर्त यह भी होती है कि वह राज का कारिंदा नहीं माना जाएगा। नरेगा का सुख भोग रहे मेरे एक मित्र को मैने यह बात बताने की जुर्रत कर डाली तो, वे बिफर पड़े और बोले, ठेके के समय भले ही हम कर्मचारी नहीं थे लेकिन आगे यह सुख लेने का प्रयास भी नहीं करें। हम भारतीय नागरिक है और हमें भी स्वतंत्रता का अधिकार है। उनके विचार जानकर मैं चुप। भला किसी के अधिकार का हनन मैं कैसे कर सकता हूं।सब कुछ साफ होने के बाद भी मन के कौने में एक बात रह-रहकर उठने का दुस्साहस किए बिना रहती कि सारे अधिकार इन धरना, प्रदर्शन के ठेकेदारों को ही क्यों मिलते हैं। ये भाई अपनी मांगे मनवाने के लिए उन करोड़ों लोगों के कितने ही अधिकारों को नेस्तनाबूत कर डालते हैं, जिनका दोष है तो इतना कि उन्हें जनता कहा जाता है। आरामदायक दफ्तरों में बैठे सरकार के नुमाइंदे कुछ न कुछ स्वार्थ के चलते ऐसे मुद्दों को हवा देते रहते हैं तो कर्मचारी नाम से अपनी पहचान रखने वाले उसमें घी डालने में पीछे नहीं रहते। दोनों की अपनी सैटिंग होती है लेकिन जनता जैसे जीव का आखिर क्या दोष है? खैर, यह मेरे से रुकने वाला नहीं, ऐसा होता आया है और होता रहेगा लेकिन...।

Saturday, August 8, 2009

न कोई रंग है जमाने में लव-आज कल के सिवा

अरविन्द शर्मा
हमारे देश में प्रेम की परंपरा अनादिकाल से चली आ रही है। उस वक्त समाज की एनओसी की आवश्यकता नहीं थी। क्योंकि प्रेम सर्वथा पवित्रता के साथ किया जाता था। लेकिन आजकल का लव रंग बिरंगा हो गया है। और जब से 'लव आज कल' के दर्शन किए है, 'आज और कल' के प्यार को समझने की उत्सुकता भी बढ़ गई है। अब तो सोचते हैं कि जमाने में मुहब्बत के रंग को छोड़ दें तो क्या कोई रंग बचा ही नहीं है। ऋषी कपूर और सेफअली खान के प्यार की फिल्मी कहानी तो कम से कम यहीं बयां कर रही है। समाज की एनओसी को तो अब के प्रेमियों ने अंगूठा दिखा दिया है। यकिन नहीं हो तो किसी भी बाग-बगीची और सार्वजनिक स्थान पर गौर फरमाकर देख लीजिए। बात रही प्रेमिका के अनापत्ति प्रमाणपत्र की तो उसमें भी दो प्रकार का फलसफा प्रचलित है। एक बिना एनओसी के तथा दूसरा बाकायदा प्रेमिका से एनओसी लेकर। इसकी बानगी भी लव पॉइंटी पर मिल जाएगी। कुछ मामलों में वन साइडेड गेम भी चल रहा है। ऐसे मामलों को हम और आप दीवाना या पागल कहकर टाल देते हैं।
इकरार नहीं होता इजहार नहीं होता।चाहकर तो किसी से प्यार नहीं होता।कई राहें गुजर हम-सफर मिलते हैं।हाथ मिलाने से ही कोई प्यार नहीं होता।।
पहले कई बार सुनते हैं कि फलां मजनूं ने प्रेम में विफल रहकर अपनी जान दे दी, लेकिन अब के मजनूं 'दिलवाले दुल्हनियां ले जाएंगे' की तर्ज पर अपनी नायिका को प्राप्त करके ही रहते हैं। मेरे कहने का आशय है कि पहले प्रेम 'नीट एंड क्लीन' था मगर इस जमाने के प्रेमी तो अगल ही रंग में भीगे हुए हैं। अब तो नायिकाओं की पहली मांग यही होती है। क्या कर सकते हैं? यह क्या कर सकते हैं, यह पहले सोचना भी पाप समझा जाता था। शायद यहीं कारण था कि ऋषी कपूर को काफी संघर्ष के बाद (लव आज कल) में अपना प्यार मिला।लव आज कल के बारे में काफी सोचा मगर जवाब अभी तक नहीं मिला था। लिहाजा मैंने प्रेम पुजारियों को पकड़ लिया। उन्होंने समझाया कि बच्चू, यह 'नादान' भी 'दीवाना' और 'पागल' होता है। जाओ और अपने प्रेम का बेखौफ इजहार कर दो। बातों को सुनकर हौंसला काफी मिला और एक कदम आगे बढ़ा दिया कि आज तो प्रेम का इजहार करके ही रहूंगा। लेकिन इसी बीच एक पत्रकार भाई ने फोन पर सूचना दी कि पहाड़ी पर एक कोने में प्रेम की पींगे भर रहे दो मजनूओं को पुलिसियां डंडे ने प्रेम की अच्छी परिभाषा सिखा दी है। फिर क्या था सरकारी चिकित्सालय के हड्डी वार्ड में पलास्टर बंधी टांगों का दर्शय आंखों के सामने आ गया।
हकीकत के करीब आने के बाद।समझा मोहब्बत दिल लगाने के बाद।मुझे गम अपना कुछ नहीं, उसका है,कौन चाहेगा उसे इतना मेरे जाने के बाद।
दीमाग में ख्याल आया कि यह तो बहुत सावधानी का खेल है, जिसमें बॉलर द्वारा फेंकी जाने वाली गेंद को भली प्रकार से समझना पड़ता है अन्यथा कोई आश्चर्य नहीं कि पहली ही बॉल पर क्लीन बोर्ड कर दिए जाओ। वैसे सच पूछो तो मेरा 'नीट एंड क्लीन' में ही ज्यादा विश्वास है। निगुर्ण, निराकारी प्रेम ही हमारे हृदय में बसा हुआ है।
प्रभु जो करता है, ठीक करता है। वही देने वाला है, देवे तो छप्पर फाड़कर दे दे अन्यथा छप्पर ज्यों का त्यों बना रहे। कबीर ने प्रेम को ढाई आखर कहा है और इसके पढऩे वाले को ज्ञानी बताया है। इस लिहाज से मैं भी उन ज्ञानियों में से हंू जो हर कार्य सोच-समझकर करते हैं। ये जो प्रेम है न, यह भी बड़े काम की चीज है। आप भी करिए, क्योंकि यह करने का काम है।