दिल के किसी न किसी कोने में भड़ास जरूर तिलमिला रही होगी। भड़ास की आग जरूर निकालिए, ताकि जलने वाले बच न पाएं। sarviind@gmail.com परभेजें।

Saturday, September 12, 2009

कोई तो बताए हम इन सपनों का क्या करें!

राही
कोई स्वाइन फ्लू से परेशान है, किसी को एड्स का डर है, किसी के डायबिटीज है तो कोई वायरल से ग्रस्त। लेकिन हम सपनों से परेशान है। ऐसे-ऐसे सपने आते हैं कि पूछो मत। अब तो हमें सपनों से डर लगने लगा है। हालांकि कलाम साहब जैसे पहुंचे विद्वानों ने कहा कि जिंदगी में आगे बढऩा है तो सपने देखो। हमने भी यही सोच कर सपने देखने शुरू किए। ऐसा नहीं है कि हमने सपने देखना अभी शुरू किया है। हमें तो बचपन से ही सपने आते थे। हमारे सपनों में तोता, कुत्ता, हाथी, बंदर आते तो जवानी में रेखा, हेमा, वहीदा और बबीता ने आना शुरू कर दिया। आजकल जो सपने आ रहे हैं, वे ही बड़े ही अजीबोगरीब है। अजीबोगरीब ही नहीं ऊटपटांग भी हैं। चलिए कुछ सपने हम आपको सुनाते हैं। एक सपना हमें कुछ महीने पहले आया था। सपने का स्टार्ट ही बड़ा जोरदार था। हमने एक मोटी सी किताब देखी। उस किताब को तैयार करने में सैकड़ो लोग जुटे थे। जब किताब तैयार हो गई तो लोगों ने हमें पकड़ कर उस किताब में बिठा दिया। हमें लगा जैसे हमें किसी लक्जरी कार में बिठा कर सीट बेल्ट बांध दी हो। अचानक वह किताब रेल की तरह चलने लगी और देखते-देखते हम छोटे से बड़े हो गए। अचानक उस किताब को ब्रेक लगा और कुछ मोटे-मोटे लोगों ने हमें पकड़ कर किताब से नीचे फेंक दिया। अब किताब एक पहाड़ बन गई। हम फिसलते हुए ऊपर से नीचे आ रहे थे। हम नीचे एक गड्ढ़े में आ गिरे, जिसमें कीचड़ जैसा कुछ भरा था। इससे पहले कि हम अल्लाह को प्यारे होते हमारी आंख खुल गई। हम पसीने-पसीने हो गए थे। देखा श्रीमती सामने खड़ी कह रही थी, क्योंजी नींद में संविधान-संविधान क्या बड़बड़ा रहे थे। अब बताइए यह भी ससुर कोई सपना हुआ। अब इस सपने का फल किसे पूछने जाएं। सपने बांचने वालों को यह सपना सुनाएं तो वह हंसने के अलावा कुछ नहीं कर सकता। कुछ दिन पहले एक सपना और आया। देखा कि सिर पर पगड़ी बांधे एक बुजुर्गवार ने हमारा हाथ पकड़ा और एक गुफा के सामने ले जाकर खड़ा कर दिया। अचानक उसने जेब से अलादीन का चिराग निकाला। उसे रगड़ा और जोर से चिल्लाया- खुल जा सिमसिम। हमने देखा कि गुफा का दरवाजा खुल गया। हम आंख फाड़कर देख ही रहे थे कि उस बुजुर्गवार ने हमारे जोरदार लात लगाई और हम गुफा में भीतर जा गिरे। गुफा क्या थी पूछो मत। चारो तरफ नोट ही नोट थे। हमने पागलों की तरह नोट उठाकर अपनी जेब से भरना शुरू कर दिया। जैसे ही दौड़ कर हम खजाने से बाहर आए तो एक सफेद आदमी ने हमें पकड़ लिया और जेब से सारा धन निकाल लिया। हमने पूछा कि यह क्या कर रहो। उसने कहा टैक्स ले रहा हूं। जब हमारी जेब खाली हो गई तो हाथ में एक नोट पकड़ा कर कहा- ले जा। भूंगड़े खा लेना। एक झटके में हमारी आंख खुल गई और हमने देखा कि हम खाट के नीचे पड़े हैं। अब आप ही कहें। इन सपनों का हम क्या करें? आजकल हमें ऐसे ही ऊटपटांग सपने आते हैं। क्या यह सपने आते ही रहेंगे या फिर कभी बंद भी होंगे।

Sunday, September 6, 2009

हे विराटरूप धारिणी दालदेवी, तुम्हें नमस्कार है!

सूर्यकुमार पांडेय
हे भारत भूमि के भोले-भाले मानुसों का गृह बजट बिगाडऩे वाली, भावों के मामले में समस्त खाद्यान्नों को पछाडऩे वाली, अपने दिव्य छिलकायित स्वरूप के समान आम आदती की दो भाग बखिया उधेडऩे वाली, तमाम दहलनों के तन-बदन पर अपनी हैसियत का झंडा गाडने वाली, अपने लघु स्वरूप में विराटरूप धारिणी, तड़कामारिणी, चमत्कारिणी दाल देवी, तुम्हें अनंत बार नमस्कार है।
हे देवी, जो रिश्ता वृक्ष का छाल से, बंदर का डाल से, रोटी का थाल से, शेयर का उछाल से, सूखी लकड़ी का टाल से, मरीज का अस्पताल से, जवाब का सवाल से, ट्रेड यूनियन का हड़ताल से, ताल का भोपाल से, उज्जैन का महाकाल से, टूरिस्ट का नैनीताल से, शैंपू का बाल से, बाल का खाल से, खाल का गाल से, पाकिस्तान का टेढ़ी चाल से, फुटबॉल का बंगाल से, घोड़े का नाल से, होली का गुलाल से, कस्टमर्स का मॉल से और मोबाइल का मिस्ड कॉल से, वहीं रिश्ता आदमी का दाल से है। हे इन सहज संबंधों की ध्वंसकारिणी, उच्चभावविहारिणी, हृदयविदारिणी दाल देवी, तुम्हें असंख्य बार नमस्कार है।
हे देखने में अदना, गोल-मटोल बदना, एक गरीब ने तुम्हें हाथ लगाना चाहा, उसे बिजली का झटका लगा। एक मजदूर ने तुम्हारा भाव पूछा और किराने की दुकान पर ही बेहोश हो गया। तुमको जिस भी किसान ने अपना खून-पसीना बहाकर रात-दिन की मेहनत से तैयार किया, तुमने उसके ही होंठों से लगने से इनकार किया। देवी, हमारे पाप क्षमा करो कि हम नीलगाय आदि पशुओं से तुम्हारी रक्षा नहीं कर पाते। तुम्हारी कृश काया को उकठा नामक रोगासुर निरंतर कष्ट प्रदान करता रहता है। हम इसके उपचार में भी अशक्त होते हैं। हे देवी, तुम अपने कोप के प्रकोप को शांत करो। प्रसन्न हो। हे क्षुधानाशिनी, बाजार उपहासिनी दाल देवी, तुम्हेें कोटि-कोटि नमस्कार हैं।
हे देवी, तुम्हारें अनंत रूप हैं। तुम न होती तो मूसलचंद का कोई पूछनहारा न होता। तुम कभी मूंग बनकर छाती पर दली जाती हो तो कभी तुअर बनकर पुअर को सताती हो। कभी मसूर की दाल बनकर मुंह तक को मुंह चिढ़ाती हो तो कभी खीचड़ रूप में पेशेंट का पथ्य बन जाती हो। जूते में बंटती हो। आयात में भी तुम्हीें हो, निर्यात में भी तुम्हीं। तुम रोटी की सहेली हो। भात की गर्लफें्रड हो। तुम हींग और जीरा की प्रिय सहेली हो। तुम बटलोई से कुकर तक की वासिनी हो पर आज तुम्हारा अदहन भी घर-घर में लंका दहन के समान प्रतीत हो रहा है। तुम्हारा न गलना हमें खल रहा है। तुम्हारे अरहरी रूप के भक्तगण क्राई कर रहे हैं, क्योंकि उलटा तुमने ही इन्हें फ्राईं कर डाला है। आज तुम कीमत के मामले में नब्बे के पार हो। बखरी, बोरी, कनस्तर और डिब्बे से फरार हो। हे जमाखोरों की आनंददायिका, लवणयुक्ता, सुस्वादु प्रदायिका, किचन नायिका दाल देवी, तुम्हें शत-शत नमस्कार है।
हे व्यंजनों की अधीश्वरी, हम तुम्हारी शरण में आए हैं। तुष्ट की चिह्वा पर चर्चा रूप में विराजिता हो। आओ, अब साक्षात हमारी चिह्वा पर चरण धरो। हमारे किचन का आधार तुम ही हो। तुम रोटी के साथ उपस्थित होकर दीन जन की क्षुधा तृप्त करने वाली आदि शक्ति हो। तुम बेसन और अनेकानेक फूड्स,स्वीट्स के मध्य स्थित होकर जीभ को तृप्ति प्रदान करनेवाली महाशक्तिदायिका हो। हे गृहदशा विदारिणी, भोजन संवारिणी, लघुस्वरूपा धनहारिणी दाल देवी, तुम्हें नमस्कार है।