दिल के किसी न किसी कोने में भड़ास जरूर तिलमिला रही होगी। भड़ास की आग जरूर निकालिए, ताकि जलने वाले बच न पाएं। sarviind@gmail.com परभेजें।

Monday, November 15, 2010

उल्‍टे अक्षरों से लिख दी भागवत गीता


आपकी खबर टीम: मिरर इमेज शैली में कई किताब लिख चुके हैं पीयूष : आप इस भाषा कोदेखेंगे तो एकबारगी भौचक्‍क रह जायेंगे। आपको समझ में नहीं आयेगा कि यहकिताब किस भाषा शैली में लिखी हुई है। पर आप ज्‍यों ही शीशे के सामनेपहुंचेंगे तो यह किताब खुद-ब-खुद बोलने लगेगी। सारे अक्षर सीधे नजरआयेंगे। इस मिरर इमेज किताब को दादरी में रहने वाले पीयूष ने लिखा है। इसतरह के अनोखे लेखन में माहिर पीयूष की यह कला एशिया बुक ऑफ वर्ल्‍डरिकार्ड में भी दर्ज है. मिलनसार पीयूष मिरर इमेज की भाषा शैली में कईकिताबें लिख चुके हैं.उनकी पहली किताब भागवद गीता थी. जिसके सभी अठारह अध्‍यायों को इन्‍होंनेमिरर इमेज शैली में लिखा. इसके अलावा दुर्गा सप्‍त, सती छंद भी मिरर इमेजहिन्‍दी और अंग्रेजी में लिखा है. सुंदरकांड भी अवधी भाषा शैली में लिखाहै. संस्‍कृत में भी आरती संग्रह लिखा है. मिरर इमेज शैली मेंहिन्‍दी-अंग्रेजी और संस्‍कृत सभी पर पीयूष की बराबर पकड़ है. 10 फरवरी1967 में जन्‍में पीयूष बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं.डिप्‍लोमा इंजीनियर पीयूष को गणित में भी महारत हासिल है. इन्‍होंने बीजगणित को बेस बनाकर एक किताब 'गणित एक अध्‍ययन' भी लिखी है. जिसमेंउन्‍होंने पास्‍कल समीकरण पर एक नया समीकरण पेश किया है. पीयूष बतातेंहैं कि पास्‍कल एक अनोखा तथा संपूर्ण त्रिभुज है. इसके अलावा एपी अधिकारएगंल और कई तरह के प्रमेय शामिल हैं. पीयूष कार्टूनिस्‍ट भी हैं. उन्‍हेंकार्टून बनाने का भी बहुत शौक है.


यह खबर पियूष ने भेजी है। gpalgoo@gmail.com 09654271007

Saturday, June 19, 2010

भोपाल गैस त्रासदी : एंडरसन, इंसाफ और सियासत

अरविन्द शर्मा
फाइलों में लगभग दफन हो भोपाल गैस त्रासदी की फाइल 25 साल बाद खुली तो एंडरसन, इंसाफ और सियासत में फंसकर रह गई। लेकिन बड़ा सवाल आज भी जवाब मांग रहा है, सवाल उस कायरत से जुड़ा है, जो उस वक्त देश के सियासतदारों ने दिखाई। अब हम अमेरिका को कोस रहे हैं? यह भी हैरान करने वाली बात है कि उस वक्त मामले को दबाने और एंडरसन को भगाने से जुड़े अफसर व सियासतदार इस मामले पर चुप्पी साधे हुए है। कई अफसर तो इस मामले की बजाए मीडिया को बनारस जैसे शहरों की खुबसूरती की बात करने के लिए कह रहे हैं। यानी हर कोई चुप्प रहना चाहता है? जाहिर है कि इस चुप्पी के पीछे ऐसा राज छिपा है जो सामने आया तो कई चेहरे बेनकाब होंगे। आज भोपाल के गैस पीडि़तों के लिए शोर मचा रहे सब लोग अपने गिरेबान में झांकें और यह सोचे कि 25 बरसों में उन्होंने गैस पीडि़तों के लिए कौनसा विशेष कार्य किया? केंद्र व राज्य सरकार मिलकर इस बात की जांच करें कि क्या सचमुच यूनियन कार्बाइड भोपाल के आस-पास का भूमिगत जल दूषित व प्रदूषित है या सिर्फ यह कोरी अफवाह है। सवाल यह भी है कि कैसे कोई संस्था वैज्ञानिक आधार पर यह दावा कर सकती है कि पानी दूषित है, वहीं राज्य सरकार कहती है कि ऐसा कुछ भी नहीं है। यूनियन कार्बाइड के आसपास का पानी बिल्कुल स्वच्छ है। हैरानी और दुख की बात है कि इस मामले में कोई कारगर कदम नहीं उठाया गया।
बड़े सवाल, जिनका चाहिए जवाब
- क्या हम
पिछले 25 बरसों से सो रहे थे। क्या हमने इन सालों में ऐसा कुछ किया है कि आगे देश में और एक भोपाल न बन पाए?
- आरोपी एंडरसन कैसे भागा?
- मैक्सिकों की खाड़ी में हुए तेल रिसाव से अमेरिका के पर्यावरण को नुकसान पहुंचा तो उन्होंने दोषी कंपनी ब्रिटिश पेट्रोलियम को और ज्यादा नुकसान पहुंचा दिया। 34 बिलियन डॉलर मांगे। कंपनी नहीं मानी तो राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कंपनी के चेयरमैन कार्ल टेनरिक स्वानबर्ग और सीईओ टोनी हेवार्ड को सीधे व्वाइट हाउस तलब किया। एक-एक डॉलर का हिसाब लिखवाया। यह कार्रवाई सिर्फ 11 लोगों की मौत पर हुई।
लेकिन, भोपाल में 15 हजार लोग मरे। कायरता देखिए, यूनियन कार्बाइड का चेयरमैन भारत पहुंचा तो हमारे विदेश सचिव ने सबसे पहले उसे सुरक्षित वापसी की गारंटी दी। वो भी भारत सरकार की ओर से। उसे वापस भी भेज दिया गया। हां, गिरफ्तारी का ड्रामा जरूर हुआ। पूरे मामले में प्रधानमंत्री राजीव गांधी चुप रहे, आखिर क्यों? क्या हम अमेरिका की दवाब में जीते हैं? क्यों नहीं दे पा रहे हैं हम लोगों को इंसाफ और जवाबदारों से क्यों नहीं मांगे जा रहे जवाब?
- भोपाल गैस पीडि़तों के लिए शोर मचा रहे नेता, अफसर व लोग अपने गिरेबान में झांके और यह सोचे कि पिछले सालों में उन्होंने गैस पीडि़तों के कल्याण के लिए अपनी ओर से ऐसा कौन सा विशेष कार्य किया है?
- गैस पीडि़तों के स्वास्थ्य कल्याण के लिए निर्मित भोपाल मेमोरियल अस्पताल ट्रस्टियों व वहां कार्यरत डॉक्टरों के आपसी झंगड़े का मंच बन गया है। कौन, कब और कैसे इस ट्रस्ट का प्रमुख व सदस्य बन गया, यह आज भी भोपाल के छह लाख गैस पीडि़तों को पता नहीं है। क्यों और किस के दबाव में अच्छे बड़े चिकित्सकों ने इस अस्पताल से किनारा कर लिया, इसका जवाब किसी के पास है?
- गैस त्रासदी का दर्द, तीसरी पीढि़ भी झेल रहे हैं, इसका न्याय कौन करेगा? क्या इसमें भी एंडरसन का दोष है? या फिर अमेरिका का दबाव कि इन छह लाख लोगों को उनके हाल पर छोड़ दो।

Saturday, June 12, 2010

इन आंसुओं से डरिए, क्योंकि इनमें साम्राज्य तक डूब सकते हैं

अरविन्द शर्मा
यहां सपने बिकते हैं, आसूं भी टपकते हैं, लेकिन इनकी कीमत....। यह सवाल इसलिए उठ रहा हैं, क्योंकि पिछले कुछ दिनों से अखबारों में इसी तरह के विज्ञापन नजर आ रहे हैं। कोई बेहतर फ्यूचर बनाने का दाव कर रहा है तो कोई यहां तक कह रहा है कि हमारे बिना आपका कॅरिअर बनना मुश्किल है। बस, इनकी कीमत चुकानी होगी। कीमत भी एक लाख रुपए से शुरू होती है। अब ऐसे में दूसरा सवाल यह भी उठता है कि केंद्र सरकार किस दम पर 14 साल के बच्चों को मुफ्त शिक्षा का दावा कर रही है। शिक्षा के नाम पर खुल रहे इन लूट के अड्डों का कड़वा सच दिल्ली से लेकर राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश और बिहार हर राज्य में कई बार नजर आ चुका है। ताजा मामला राजस्थान के सवाईमाधोपुर का है। मैंने टीवी और अखबारों में जब यह खबर देखी तो होश उड़ाने लाजमी थे। समाज कल्याण विभाग की तरफ से बांटी जा रही है कॉलेजों को छात्रवृत्तियों की जांच वहां के कलेक्टर ने जांची तो सबके होश उड़ गए। 100 करोड़ से अधिक की छात्रवृत्तियां ऐसे कॉलेजों को बांटी गई जो या तो है या नहीं, या फिर ऐसे कॉलेजों को, जिनमें चार सालों से एक भी छात्र पढऩे नहीं आ रहा। देखा जाए तो यह खेल सरकार के आला अफसरों की मिलीभगत से चलना मुश्किल है। हालांकि मीडिया में मामला सामने आने के बाद दो डिप्टी डायरेक्टर हटाने के साथ जांच बैठा दी गई। यह अलग बात है कि इस जांच का नतीजा क्या होगा? तीसरे तस्वीर ऐसे बच्चों की हैं, जो पढ़ाई के लिए एक-एक पाई के लिए तरस रहे हैं। सरकारी दफ्तरों पर एडिय़ा रगडऩे के बाद भी उन्हें सरकार की तरफ से एक रुपया भी नहीं मिल पा रहा है। हां, इन सरकारी दफ्तरों के बाहर की जमीन आसुओं से गिली जरूर है। परंतु गरीब के आंसू से गिली हुई जमीन पर कुछ नहीं उगता। यह बात गरीब को भी समझनी होगी। उन्हें जानना होगा कि वे उन लोगों को काम आसान कर रहे हैं, जो मदद की रूमाल लिए साथ घूमते हैं। इन सपनों के सौदागरों से तो हमारा यही कहना है.... इन आसुंओं से डरे...। गरीब के आंसुओं में साम्राज्य तक डूब सकते हैं, हम आपकी तो फिर औकात ही क्या।

Saturday, January 30, 2010

आज भी हनुमान से नाराज हैं लोग


सबसे बड़ी चीज होती है विश्वास। पर जब उस पर चोट पहुंचती है तो पीड़ा देनेवाले को बख्शा नहीं जाता है। फिर चाहे वह देवता या भगवान ही क्यों न हो। जी हाँ! दुर्गम पर्वतॊं पर बसा एक गांव ऐसा भी है जहां के लोग आज भी हनुमान जी से सख्त नाराज हैं। कारण कि हनुमान ने उन लोगों के आराध्य देव पर चोट पहुंचायी है और सरासर अहित किया है। यह आराध्य देव कोई और नहीं स्यंव साक्षात ‘पर्वत ही हैं, जिसका नाम है-द्रोणागिरी। सभी जानते हैं कि इस पर्वत में संजीवनी बूटी विद्धमान होने से हनुमान एक भाग तोड़कर ले उड़े थे। इसी पुराण-प्रसिद्ध द्रोणागिरि पर्वत की छांव में बसे हनुमान से नफरत करने वाले गांव का नाम है-द्रोणागिरि।
इस बारे में द्रोणागिरि गांव में एक दूसरी ही मान्यता प्रचलित है। बताते हैं कि जब हनुमान बूटी लेने के लिये इस गांव में पहुंचे तो वे भ्रम में पड़ गए। उन्हें कुछ सूझ नहीं रहा था कि किस पर्वत पर संजीवनी बूटी हो सकती है। तब गांव में उन्हें एक वृद्ध महिला दिखाई दी। उन्होंने पूछा कि संजीवनी बूटी किस पर्वत पर होगी? वृद्धा ने द्रोणागिरि पर्वत की तरफ इशारा किया। हनुमान उड़कर पर्वत पर गये पर बूटी कहां होगी यह पता न कर सके। वे फिर गांव में उतरे और वृद्धा से बूटीवाली जगह पूछने लगे। जब वृद्धा ने बूटीवाला पर्वत दिखाया तो हनुमान ने उस पर्वत के काफी बड़े हिस्से को तोड़ा और पर्वत को लेकर उड़ते बने। बताते हैं कि जिस वृद्धा ने हनुमान की मदद की थी उसका सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया।
आज भी इस गांव के आराध्य देव पर्वत क विशेष पूजा पर लोग महिलाओं के हाथ का दिया नहीं खाते हैं और न ही महिलायें इस पूजा में मुखर होकर भाग लेती हैं। गांव की पत्रिता के लिए आज भी जब किसी महिला का बच्चा होता है तो प्रसव के दौरान उस महिला को गांव से अलग काफी दूर नदी के किनारे वाले स्थान पर डेरा बनाकर रखा जाता है। शिशु जनने के बाद ही वह गांव आ सकती है। इस दौरान उसका पति, सास अन्य परिवारजन उसकी मदद करते हैं। :sabhar:hellohimalaya.blogspot.com

Monday, January 25, 2010

यहां ग्रामीण चलाते हैं रेलवे स्टेशन


गणतंत्र की मिसाल देखनी हो तो राजस्थान के झुंझुनूं जिले में चले आइए। यहां आप जानेंगे कि गणतंत्र का मतलब और सोचने पर मजबूर भी होंगे कि ऐसे लोग नहीं तो आज तस्वीर कैसी होती।
जयपुर से 146 किलोमीटर की दूरी पर स्थित बलवंतपुरा-चैलासी रेलवे स्टेशन पर पहुंचते ही हमारा सामना एक सुखद आश्चर्य से होता है। यह स्टेशन जन प्रयासों का बेमिसाल नमूना तो है ही, आजाद भारत का एकमात्र स्टेशन भी होगा, जिसे ग्रामीणों ने बनाया तो है ही, प्रबंधन और संचालन भी रेलवे नहीं बल्कि उन्हीं के हाथों में है।
सुनियोजित तरीके से स्टेशन की बागडोर संभाल रहे ये हाथ झुंझुनूं के पांच ग्राम पंचायतों के हैं, जो तूफानी जुनून से भारत के विकास को अपने दम पर ताकत देने में जुटे हैं। बलवंतपुरा-चैलासी स्टेशन ग्रामीणों के संकल्प व प्रतिबद्धता का प्रतीक भी है। वह इसलिए भी क्योंकि पांच साल से पांच पंचायतों के ग्रामीण बिना सरकारी मदद के सफलतापूर्वक स्टेशन का संचालन कर रहे हैं। ये लाग पूंजीपति भी नहीं हैं। इनके गांव में तो बुनियादी सुविधाएं तक नहीं हैं। स्टेशन बनने के पीछे भी बुलंद इरादों का एक पूरा संघर्ष छिपा है। दरअसल, स्टेशन की मांग 1996 से उठ रही थी। आंदोलन के बाद भी जब मांग नहीं मानी गई तो ग्रामीणों ने हताश होने केबजाय नया रास्ता खोज निकाला।
गांव के लोगों ने डेढ़ सौ लोगों से चंदा लेकर पंद्रह लाख रुपए जुटाए और स्टेशन को बनाने में जुट गए। स्टेशन बनने के बाद अब समस्या यहां ट्रेन रुकने और टिकट की थी। जयपुर से लेकर दिल्ली तक कोई अधिकारी नहीं बचा, जिसे इन लोगों ने पत्र न लिखा हो। जद्दोजहद के बाद रेलवे ट्रेन रोकने और टिकट बांटने पर तो राजी हो गया, लेकिन शर्त रखी कि स्टेशन की पूरी व्यवस्था ग्रामीण ही करेंगे। आखिरकार, 3 जनवरी, 2005 को पहली ट्रेन रुकी और ग्रामीणों का सपना सच हुआ। आज आठ ट्रेन रुकती हैं और 300 यात्री सफर करते हैं। यहां टिकट बांटने की कहानी भी बड़ी अजीब है। अगर ट्रेन जयपुर से बलवंतपुरा-चैलासी रेलवे स्टेशन आ रही है तो गार्ड सीकर से और लोहारू से आते समय मुकुंदगढ़ से टिकट लेकर आता है और बांटता है।
स्टेशन पर पूरी व्यवस्था ग्रामीणों के हाथों में है। पानी से लेकर बैठने, टिकट बांटते वक्त लोगों को एक कतार में रखने और खुल्ले पैसे तक का जुगाड़ भी यहां तैनात ग्रामीण ही करते हैं। स्टेशन की व्यवस्था देख रहे चैलासी गांव के 65 वर्षीय बजरंग जांगिड कहते हैं कि हम इस स्टेशन को पूरे देश का आदर्श रेलवे स्टेशन बना देंगे। बकौल जांगिड, रेलवे स्टेशन तो आसानी से बन गया। अब सबसे ज्यादा चुनौतीभरा काम है, स्टेशन को व्यवस्थित करना। (sabhar : lp pant)

Saturday, January 23, 2010

गायब न हो जाए पायल की झनकार!


अरविन्द शर्मा
आठ माह की इस मासूम के सपने उम्र से भी कई बड़े हैं, मगर सपनों के आड़े आ गई है तो उसकी बीमारी। वह चहकना और जीना भी चाहती है। लेकिन यह बीमारी उसे यह सब करने के लिए रोक रही है। ईश्वर ने उसे इस उम्र में ही ऐसा रोग दे दिया है कि वह खुद पूरी तरह सांस भी नहीं ले पाती है। वह सांस ले तो रही है, लेकिन ये सांसें कभी भी किसी भी वक्त थम सकती है। ऐसा नहीं है कि उसका रोग असाध्य है। उसका इलाज है, लेकिन आड़े आ रही है तो आर्थिक तंगी। आठ माह की यह मासूम है राजस्थान के सीकर की पायल। उसे 'ट्राई कस्पिड अट्रेजिया'रोग है।
अपनी मां की गोद में लेटी पायल को देखकर अस्पताल में आने-जाने वाले हर किसी के कदम ठिठक जाते हैं। पायल के माता-पिता आंखों में तो अब पानी ही पानी रहता है। पायल की बीमारी से घबराए वे बार-बार दौड़कर चिकित्सक के पास जाते हैं और दिल्ली जाने की सलाह के साथ वापस लौट आते हैं। चिकित्सकों ने पायल के दिल में 'ट्राई कस्पिड अट्रेजिया' रोग बताया है। इस रोग से दिल रक्त का शुद्धिकरण नहीं कर पाता। पायल की मां रेखा और पिता अशोक शर्मा की मानें तो उन्हें इस रोग की जानकारी करीब 25 दिन पहले हुई। बुखार होने पर वे पायल को यहां एक निजी चिकित्सक के पास ले गए थे। चिकित्सक ने दो दिन तक भर्ती रखने के बाद पायल को जयपुर रैफर कर दिया। जयपुर में चिकित्सकों ने जांच के बाद पायल के दिल में ट्राई कस्पिड अट्रेजिया रोग बताया। साथ ही जल्द दिल्ली ले जाकर ऑपरेशन करवाने की सलाह दी। लेकिन ऑपरेशन का पैसा नहीं होने के कारण उसके माता-पिता वापस सीकर ले आए। पायल के पिता अशोक शर्मा निजी स्कूल में कम्यूटर ट्यूटर का कार्य करते हैं। इस कार्य के लिए उसे तीन हजार रुपए पगार मिलती है। पायल के अलावा उनके दो बेटियां और एक बेटा भी है। बकौल अशोक परिवार का गुजारा ही बमुश्किल हो पाता है। पायल के दिल के ऑपरेशन का खर्चा चिकित्सक ने तीन लाख रूपए बताया है। पायल की मां रेखा ने बताया कि सीकर और जयपुर में इलाज में ही अब तक 35 हजार रुपए खर्च हो गए हैं। उसके भाइयों ने इसमें सहयोग किया है। लेकिन उनकी आर्थिक स्थिति भी इतने पैसों का इंतजाम करने के जैसी नहीं है।
गंभीर है स्थिति
बच्ची को 'ट्राई कस्पिड अट्रेजिया' रोग है। इस रोग में दिल का एक वॉल काम नहीं करता है। इससे रक्त का शुद्धिकरण नहीं हो पाता। ऑपरेशन ही इसका एक मात्र उपाय है। वर्तमान में बच्ची की स्थिति बेहद गंभीर है। जल्द ऑपरेशन की आवश्यकता है। इसे ऑक्सिजन के सहारे रखा गया है। इस परिवार की कमजोर आर्थिक स्थिति को देखते हुए अस्पताल हर संभव सहयोग करने के लिए तैयार है।

Saturday, January 16, 2010

मेरी धरती पर जन्म लेगी ब्रह्मोस मिसाइल


अरविन्द शर्मा
शेखावाटी में पिछले अर्से से शोध, प्राकृतिक चिकित्सा एवं ग्रामीण पर्यटन के लिए जो माहौल बना है, उससे काफी कुछ करने की गुंजाइशों को पंख लग गए हैं। इससे एक बात तो तय हो गई है कि अब घरेलु पर्यटक शेखावाटी के धार्मिक स्थलों पर जात-जड़ूले और विदेशी पर्यटक ओपन आर्ट गैलरी के रूप विलास को देखने ही ही नहीं आ रहे हैं, बल्कि इन सबसे अलग भी यहां बहुत कुछ ऐसा है, जो दुनियाभार को आकर्षित कर रहा है। इसकी वजह यहां की कुछ खासियतें हैं, जो कि इस क्षेत्र की अलग पहचान और प्रतिष्ठा बना रही हंै।
इसी कड़ी में जो नाम शामिल हुआ है, वह वाकिये सोचने पर मजबूर नहीं करता है, बल्कि दुश्मनों के दांत भी खट्टे कर सकता है। देश को एक लाख से अधिक सैनिक दे चुके शेखावाटी की धरा पर अब ब्रह्मोस मिसाइल भी बनाई जाएगी। इसके लिए झुंझुनूं जिले के पिलानी के पास स्थित श्योसिंहपुरा, पीपली व डूलानिया में ब्रह्मोस मिसाइल प्रोडेक्शन सेंटर बनाने की कवायद शुरू हो चुकी है। जिसकी मिट्टी के कण-कण में देशभक्ति का जज्बा खून बनकर दौड़ता हो, सोचो ब्रह्मोस मिसाइल की एक बारगी तो अपने को धन्य ही मानेगी, क्योंकि यहां की मिट्टी पर उसका जन्म जो होने जा रहा है। राजस्थान सरकार ने रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन को सुपसोनिक क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस बनाने का कारखाना स्थापित करने के लिए 80 हैक्टेयर जमीन देने की मंजूरी दे दी है। डीआरडीओ की मानें तो दो साल में यहां मिसाइलों का उत्पादन भी शुरू हो जाएगा। यह कितनी बड़ी खुशी है, खुद पूर्व सैनिक भूराराम की जुबानी सुन लीजिए। कहते हैं, उन्होंने भी सेना में रहकर देश सेवा की है तथा अब उनके गांव में ही ब्रह्मोस मिसाइल का निर्माण उनके लिए सुखद पल है।

अमित जी, यह ऑरो 'पा' भी नहीं बोल पाता


अरविन्द शर्मा
आपने अमिताभ बच्चन की हालिया रीलिज 'पाÓ जरूरी देखी होगी और अमितजी के किरदार के कायल भी आप हो गए होंगे। लेकिन हकीकत का ऑरो 'पा' भी नहीं बोल पाता है। और यहां हकीकत में इस ऑरो का नाम अमित है। यह ऑरो न तो चल पा रहा है और न ही ठीक से बैठ पा रहा है। यहां तक की अब वह 'पा' भी नहीं बोल पाता है। चार वर्षीय अमित जयपुर के एक अस्पताल में दस दिन भर्ती रहकर घर लौट आया है। झुंझुनूं जिले से करीब 17 किमी पर बसे शिशियां गांव से आगे कच्चे रास्ते पर एक ढाणी में अमित का घर है। अमित प्रोजेरिया नामक बीमारी से पीडि़त है। अमित के मम्मी-पापा, दादी-दादा भावानात्मक दर्द को दिन-रात जी रहे हैं। उसके घरवालों ने तो अभी यह फिल्म देखी भी नहीं है। मासूम दुबली काया अब उसके बड़े सिर के बोझ को झेल नहीं पाती, उसके शरीर के आधे हिस्से में पेरेलाइसिस भी हो गया है। उसके बिना सहारे दिए सीधे बैठा भी नहीं जाता। फिर भी इस मासूम के दर्द सहने की ताकत गजब है।
बहुत तकलीफ में है असली ऑरो
अमित पूरे घर का चहेता है, यहां तक कि बच्चों का भी। 15 दिन पहले तक वह खूब खेलता था, मस्ती-शैतानी भी करता था, कुछ भी खा-पी लेता। आने-जाने वालों को राम-राम और टाटा भी करता था। याददाश्त भी खूब तेज, अंग्रेजी में बॉडी पाटर््स के नाम भी याद हैं। सैना से रिटायर अमित के बुजुर्ग दादा शिशपाल और पापा राजपाल ने ऐसा कोई डॉक्टर नहीं छोड़ा, जहां उसके ठीक होने की उम्मीद थी। दादी परमेश्वरी और मां अनिता ने कोई मंदिर-देवला नहीं छोड़ा, पर मन्नत फली नहीं। घरवाले बताते हैं कि जब यह डेढ़ साल का था, तभी सये वह ऑरो जैसा दिखने लगा था। दस महीने का हुआ तो सारे बाल उड़ गए और सिर पर नसें साफ उभरती दिखने लगीं। हाथ-पैर बिल्कुल लकड़ी जैसे दुबले होते गए, जिससे सिर का आकार बड़ा होने लगा।
आप चाहते हैं मदद करना
अगर आप अमित की मदद करना चाहते हैं तो 'आपकी खबरÓ ब्लॉग की मुहिम में जुट जाइए। अमित के दादा शिशपाल चौधरी से मोबाइल नंबर 09667288725 के जरिए संपर्क कर सकते हैं या हमें ईमेल करें और कमेंट करें।