दिल के किसी न किसी कोने में भड़ास जरूर तिलमिला रही होगी। भड़ास की आग जरूर निकालिए, ताकि जलने वाले बच न पाएं। sarviind@gmail.com परभेजें।

Saturday, June 19, 2010

भोपाल गैस त्रासदी : एंडरसन, इंसाफ और सियासत

अरविन्द शर्मा
फाइलों में लगभग दफन हो भोपाल गैस त्रासदी की फाइल 25 साल बाद खुली तो एंडरसन, इंसाफ और सियासत में फंसकर रह गई। लेकिन बड़ा सवाल आज भी जवाब मांग रहा है, सवाल उस कायरत से जुड़ा है, जो उस वक्त देश के सियासतदारों ने दिखाई। अब हम अमेरिका को कोस रहे हैं? यह भी हैरान करने वाली बात है कि उस वक्त मामले को दबाने और एंडरसन को भगाने से जुड़े अफसर व सियासतदार इस मामले पर चुप्पी साधे हुए है। कई अफसर तो इस मामले की बजाए मीडिया को बनारस जैसे शहरों की खुबसूरती की बात करने के लिए कह रहे हैं। यानी हर कोई चुप्प रहना चाहता है? जाहिर है कि इस चुप्पी के पीछे ऐसा राज छिपा है जो सामने आया तो कई चेहरे बेनकाब होंगे। आज भोपाल के गैस पीडि़तों के लिए शोर मचा रहे सब लोग अपने गिरेबान में झांकें और यह सोचे कि 25 बरसों में उन्होंने गैस पीडि़तों के लिए कौनसा विशेष कार्य किया? केंद्र व राज्य सरकार मिलकर इस बात की जांच करें कि क्या सचमुच यूनियन कार्बाइड भोपाल के आस-पास का भूमिगत जल दूषित व प्रदूषित है या सिर्फ यह कोरी अफवाह है। सवाल यह भी है कि कैसे कोई संस्था वैज्ञानिक आधार पर यह दावा कर सकती है कि पानी दूषित है, वहीं राज्य सरकार कहती है कि ऐसा कुछ भी नहीं है। यूनियन कार्बाइड के आसपास का पानी बिल्कुल स्वच्छ है। हैरानी और दुख की बात है कि इस मामले में कोई कारगर कदम नहीं उठाया गया।
बड़े सवाल, जिनका चाहिए जवाब
- क्या हम
पिछले 25 बरसों से सो रहे थे। क्या हमने इन सालों में ऐसा कुछ किया है कि आगे देश में और एक भोपाल न बन पाए?
- आरोपी एंडरसन कैसे भागा?
- मैक्सिकों की खाड़ी में हुए तेल रिसाव से अमेरिका के पर्यावरण को नुकसान पहुंचा तो उन्होंने दोषी कंपनी ब्रिटिश पेट्रोलियम को और ज्यादा नुकसान पहुंचा दिया। 34 बिलियन डॉलर मांगे। कंपनी नहीं मानी तो राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कंपनी के चेयरमैन कार्ल टेनरिक स्वानबर्ग और सीईओ टोनी हेवार्ड को सीधे व्वाइट हाउस तलब किया। एक-एक डॉलर का हिसाब लिखवाया। यह कार्रवाई सिर्फ 11 लोगों की मौत पर हुई।
लेकिन, भोपाल में 15 हजार लोग मरे। कायरता देखिए, यूनियन कार्बाइड का चेयरमैन भारत पहुंचा तो हमारे विदेश सचिव ने सबसे पहले उसे सुरक्षित वापसी की गारंटी दी। वो भी भारत सरकार की ओर से। उसे वापस भी भेज दिया गया। हां, गिरफ्तारी का ड्रामा जरूर हुआ। पूरे मामले में प्रधानमंत्री राजीव गांधी चुप रहे, आखिर क्यों? क्या हम अमेरिका की दवाब में जीते हैं? क्यों नहीं दे पा रहे हैं हम लोगों को इंसाफ और जवाबदारों से क्यों नहीं मांगे जा रहे जवाब?
- भोपाल गैस पीडि़तों के लिए शोर मचा रहे नेता, अफसर व लोग अपने गिरेबान में झांके और यह सोचे कि पिछले सालों में उन्होंने गैस पीडि़तों के कल्याण के लिए अपनी ओर से ऐसा कौन सा विशेष कार्य किया है?
- गैस पीडि़तों के स्वास्थ्य कल्याण के लिए निर्मित भोपाल मेमोरियल अस्पताल ट्रस्टियों व वहां कार्यरत डॉक्टरों के आपसी झंगड़े का मंच बन गया है। कौन, कब और कैसे इस ट्रस्ट का प्रमुख व सदस्य बन गया, यह आज भी भोपाल के छह लाख गैस पीडि़तों को पता नहीं है। क्यों और किस के दबाव में अच्छे बड़े चिकित्सकों ने इस अस्पताल से किनारा कर लिया, इसका जवाब किसी के पास है?
- गैस त्रासदी का दर्द, तीसरी पीढि़ भी झेल रहे हैं, इसका न्याय कौन करेगा? क्या इसमें भी एंडरसन का दोष है? या फिर अमेरिका का दबाव कि इन छह लाख लोगों को उनके हाल पर छोड़ दो।

Saturday, June 12, 2010

इन आंसुओं से डरिए, क्योंकि इनमें साम्राज्य तक डूब सकते हैं

अरविन्द शर्मा
यहां सपने बिकते हैं, आसूं भी टपकते हैं, लेकिन इनकी कीमत....। यह सवाल इसलिए उठ रहा हैं, क्योंकि पिछले कुछ दिनों से अखबारों में इसी तरह के विज्ञापन नजर आ रहे हैं। कोई बेहतर फ्यूचर बनाने का दाव कर रहा है तो कोई यहां तक कह रहा है कि हमारे बिना आपका कॅरिअर बनना मुश्किल है। बस, इनकी कीमत चुकानी होगी। कीमत भी एक लाख रुपए से शुरू होती है। अब ऐसे में दूसरा सवाल यह भी उठता है कि केंद्र सरकार किस दम पर 14 साल के बच्चों को मुफ्त शिक्षा का दावा कर रही है। शिक्षा के नाम पर खुल रहे इन लूट के अड्डों का कड़वा सच दिल्ली से लेकर राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश और बिहार हर राज्य में कई बार नजर आ चुका है। ताजा मामला राजस्थान के सवाईमाधोपुर का है। मैंने टीवी और अखबारों में जब यह खबर देखी तो होश उड़ाने लाजमी थे। समाज कल्याण विभाग की तरफ से बांटी जा रही है कॉलेजों को छात्रवृत्तियों की जांच वहां के कलेक्टर ने जांची तो सबके होश उड़ गए। 100 करोड़ से अधिक की छात्रवृत्तियां ऐसे कॉलेजों को बांटी गई जो या तो है या नहीं, या फिर ऐसे कॉलेजों को, जिनमें चार सालों से एक भी छात्र पढऩे नहीं आ रहा। देखा जाए तो यह खेल सरकार के आला अफसरों की मिलीभगत से चलना मुश्किल है। हालांकि मीडिया में मामला सामने आने के बाद दो डिप्टी डायरेक्टर हटाने के साथ जांच बैठा दी गई। यह अलग बात है कि इस जांच का नतीजा क्या होगा? तीसरे तस्वीर ऐसे बच्चों की हैं, जो पढ़ाई के लिए एक-एक पाई के लिए तरस रहे हैं। सरकारी दफ्तरों पर एडिय़ा रगडऩे के बाद भी उन्हें सरकार की तरफ से एक रुपया भी नहीं मिल पा रहा है। हां, इन सरकारी दफ्तरों के बाहर की जमीन आसुओं से गिली जरूर है। परंतु गरीब के आंसू से गिली हुई जमीन पर कुछ नहीं उगता। यह बात गरीब को भी समझनी होगी। उन्हें जानना होगा कि वे उन लोगों को काम आसान कर रहे हैं, जो मदद की रूमाल लिए साथ घूमते हैं। इन सपनों के सौदागरों से तो हमारा यही कहना है.... इन आसुंओं से डरे...। गरीब के आंसुओं में साम्राज्य तक डूब सकते हैं, हम आपकी तो फिर औकात ही क्या।