दिल के किसी न किसी कोने में भड़ास जरूर तिलमिला रही होगी। भड़ास की आग जरूर निकालिए, ताकि जलने वाले बच न पाएं। sarviind@gmail.com परभेजें।

Friday, August 14, 2009

आज 'सूखा दिवस': फिर भी हम आजाद है!

अरविन्द शर्मा
आजादी के मौके पर आज हमें एक तांगे वाले की कहानी याद आ गई। एक तांगे वाले के तांगे में लीडर लोग बैठकर घर से मयखाने जाते थे। आते वक्त वे बतियाते कि आजादी मिलने के बाद सब कुछ बदल जाएगा। गरीब गरीब न रहेगा। गरीबी-अमीरी की खाई पट जाएगी। सबको बोलने की आजादी होगी। जमाखोरों का धन लूटकर गरीबों में बांट दिया जाएगा। लीडरों की बात पर उसे यकीन हो गया। आजादी के दिन उसे लगा कि अब तो मैं आजाद हूं सो चौराहे पर जाकर बढ़ती महंगाई के खिलाफ बोलने लगा- यह कैसा राज। जहां मुझे और मेरे घोड़े को दो मुट्ठी दाल भी न मिले। राज के सिपाही ने यह सुन लिया। वह तांगे वाले के पास गया और उसके दो डंडे लगाकर बोला-अबे ज्यादा चिल्प-पों मत कर। चल भाग यहां से। तांगे वाले को समझ नहीं आया कि यह कैसी आजादी, जहां सच बोलने पर भी डंडे पड़ते हों। यह तो एक कहानी है। लेकिन सवाल आज भी कायम है कि क्या हम आजाद है? विश्व बैंक के मुताबिक, 75 फीसदी भारतीय दो डॉलर प्रतिदिन से कम में जीवन यापन कर रहे हैं। करोड़ों लोग भूखे पेट सोने को मजबूर है। फिर भी हम आजाद है। आम आदमी महंगाई के पंजों में जकड़ा हुआ है और सरकार आंखें मुंदे बैठी है। फिर भी हम आजाद है। आपके जहेन में स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संख्या पर राष्ट्रपति का बयान भी ताजा होगा कि शासन भ्रष्टाचार में फंसता जा रहा है। यह सच भी है। फिर भी हम आजाद है। याद कीजिए स्वतंत्रता दिवस का वो दिन, जब पूरा देश आजादी की खुशियां मना रहा था और गांधीजी एक कमरे में अंधेरा किए आंसू बहा रहे थे। आखिर क्यों? संसद पर आतंकी हमले की घटना, मुंबई पर 26/11 का हमला, मुंबई में सिरियल ब्लास्ट और न जाने कितने हमले। फिर भी हम आजाद है। वो घटनाएं भी याद कीजिए, कई राज्यों में महिलाओं को निर्वस्त्र करके सरेआम पीटा गया। वो दिन भी याद कीजिए, जब गांधीजी की पुरानी चीजें विदेशों में नीलाम हो रही थी, लेकिन सरकार चुप थी। लेकिन फिर भी हम आजाद है।जिन लोगों ने आजादी के लिए बलिदान किया उन्हीं की औलाद सरकारी खजाना लूटने में जुट गई। उनमें और डाकुओं में फर्क सिर्फ इतना था कि डाकू जान जोखिम में डालकर लूट-खसोट करते थे और ये लोग गरीबों के आंसू पोंछने के नाम पर खजानों से माल सूंतते रहे। देखते-देखते नेताओं की तोंद के घेरे में अप्रत्याशित इजाफा हो गया। जो कल तक हाथ पसारे फिरते थे वे धन्नासेठों के बाप बन गए और आम आदमी का शरीर हड्डियों में तब्दील होता गया। लेकिन फिर भी हम आजाद है.......।

मेरी पड़ोसन खाय दही, मोसे कैसे जाय सही

अरविन्द शर्मा
हमारे यहां यह कहावत लंबे समय से चली आ रही है, 'मेरी पड़ोसन खाय दही, मोसे कैसे जाय सही'। ऐसी खबर पिछले दिनों मैंने अखबार में पढ़ी तो बचपन से चौबीस तक की जिंदगी सिनेमा की रील की तरह आंखों के सामने से गुजर गई। दिमाग ने कहा कि नहीं इस बात पर यकीन करना बेमानी है, लेकिन क्या करें यह कमबख्त दिल है की मानता ही नहीं, चाहे कोई कितना भी समझाए। दिल का भी क्या कहना, इसी दौरान कोई खुबसूरत बला आंखों के सामने से गुजरी तो दिल बाबू की ताक-झांक फिर से शुरू हो गई। अगर पड़ोस चैन से रोटी खा रहा है तो वह भी हमें सहन नहीं होता। मेरे पड़ोसी और कुछ साथियों को भी रोटी नहीं पचती है, जब तक हमारी बुराई नहीं कर दें। अब अपने पड़ोसियों को ही देख लो। भारत में क्या चल रहा है? इसकी प्रतिक्रिया अपने देश से ज्यादा पाकिस्तान में होती है। और सीमापार की खबरों ने के लिए भी हम मचलते रहते हैं। ताकना भी कई तरह का होता है। कुछ लोग चोरी-चोरी ताकते हैं। सीधे ताकने की हिम्मत नहीं होती। यह ताका-झांकी किशोरावस्था में चलती है। देखने वाले ऐसे ताकते हैं जैसे आंखों से काजल चुरा रहे हों। युवावस्था में आशिक की नजरें सीधी होने लगती है। पर यहां की कुछ शर्मोहया बची रहती है। दिल में धुकधुकी सी रहती है कि कहीं जिसे ताका जा रहा है वह रिजेक्ट न कर दे। अधेड़ावस्था तक ताका-झांकी में बेशर्मी छा जाती है। लेकिन यहां भी कुछ मानते नहीं है। कुछ लोग बागों में सिर्फ इसलिए घूमने जाते हैं कि वहां खिलती कलियों और फूलों को निहार सकें। अपने कुछ मित्र लोगों को भी यह आदत है। वैसे ताकने-झांकने के लिए बुढ़ापा काफी मुफिद होता है। आदमी उल्लू की मानिद ताकता रहता है पर कोई उस पर ध्यान नहीं देता। बाज शख्स तो सौंदर्य का नजारों से ही नहीं कदमों से पीछा करना शुरू कर देते हैं। ऐसे लोगों को सरे बाजार पिटते देखा गया है। बहरहाल हमारी तो युवाओं को यही सलाह है कि गति से प्रथम सुरक्षा रखें। तेज नजरों और तेज कदमों से दौडऩे की अपेक्षा हौले-हौले चलें। तेज दौडऩे वाले ही ठोकर खाकर गिरते हैं। बेहतर तो यही है कि इस ताका-झांकी की आदत से बाज आ लिया जाए। जिंदगी में एक बरस कम नहीं होता।