बेरोजगारों का दर्द कौन समझेगा? न तो बेरोजगारों की संख्या किसी को मालूम है और न ही उनके जीवन के भीतर की कहानी

मैं बेरोजगार हूं! सीरिज-10
राजस्थान में बेरोजगारों की न तो संख्या किसी को मालूम है और न ही उनके जीवन के भीतर की कहानी. हमारे लिए बेरोजगार हमेशा नाकाबिल नौजवान होता है जो मौके की तलाश में एक ही शहर और एक ही कमरे में कई साल तक पड़ा रहता है. कई बार तो लोग इसलिए भी बेकार कहते हैं कि वह सरकारी नौकरी की तलाश कर रहा है. सरकार चलाने के लिए नेता मारा मारी किए रहते हैं, लेकिन जब कोई नौजवान उसी सरकार में अपने लिए संभावना की मांग करता है तो उसे फालतू समझा जाने लगता है. आप या हम हर शहर में बेरोजगारों की रैली देखते हैं, नजर घुमा लेते हैं. वे हफ्तों से धरने पर बैठे रहते हैं उनकी परवाह कोई नहीं करता है.
हमारी सीरिज की यह दसवीं सीरिज है, लेकिन राजस्थान के बेरोजगारों की दर्द की कहानियां खत्म ही नहीं हो रही. हर दिन युवा उम्मीदों के साथ मुझे ट्विटर, ईमेल और वाट्सएप पर कई बातें लिखते हैं. वे उम्मीद करते हैं कि मैं उनकी बातें सरकार तक पहुंचाऊं. हैरानी यह होती है कि सरकार उनकी सुनने को क्यों तैयार नहीं है. यह मैं लंबे समय से लिख रहा हूं कि अगर सरकार को सुनना ही नहीं है तो वह साफ-साफ कह दें. बेरोजगारों काे क्यों गुमराह किया जाता है. छात्र पीके सहारन ने लिखा कि सरकार अंधी हो चुकी है. ओटी टेक्निशियन का कैडर तक नहीं बनाया गया है. कांग्रेस सरकार अपनी ही भर्तियों को क्यों पूरा नहीं करना चाहती. साल 2013 में पंचायतीराज विभाग में 19515 पदों पर एलडीसी भर्ती निकाली गई, लेकिन 2020 का खत्म होने को है, 10029 पदों पर अभी तक नियुक्ति नहीं की गई. छात्र अमरित शर्मा ने लिखा-आठ साल से इंतजार. परिवार को खुशियां देने का काम राजस्थान सरकार कब करेगी. ये छात्र हर दिन ट्विटर पर कैंपेन चला रहे हैं कि इस उम्मीद में कि किसी अखबार के कोने में खबर छप जाएगी. इस उम्मीद में कि मुख्यमंत्री से मुलाकात का वक्त मिल जाएगा. इस उम्मीद में कि उनकी बातों पर सरकार कार्यवाही कर लेगी.

नेताओं के पास इतने संसाधन हैं कि वो इस जनता के बीच से अपने लिए भीड़ बना लेगा, राज कर लेगा, जो भीड़ में नहीं होगी या जिसके पास समस्याओं की फाइलें होंगी वो उस भीड़ से बाहर कर दी जाएगी, इस उम्मीद में कि कोई मीडिया वाला उठाएगा. शिव जड़िया लिखते हैं कि यह सरकार पर बड़ा सवाल है कि टीडी दल के हमले के बाद भी सरकार ने कृषि पर्यवेक्षक क्यों नियुक्त नहीं किए? कमलेश गुर्जर ने लिखा कि नर्सिंग भर्ती-2018 के पदस्थापन में भी कुछ ऐसा ही हुआ है। लॉ मेरिट वालों को भरतपुर और हाई मेरिट वालों को सीधे बाड़मेर. कौनसा नियम लगाया है? जब सीएम के निर्देश है कि फर्स्ट पदस्थापन मेरिट से होगा तो फिर भी अधिकारी ऐसा क्यों कर रहे हैं? 18 मई के सीएस के आदेश को दरकिनार कर दिया? यानी हर अफसर भी अब सरकार से बड़ा होता जा रहा है। एलडीसी-2018 भर्ती को मानो मजाक ही बन गई है. हर कोई अफसर इसमें अपने-अपने प्रयोग कर रहा है. कोई 587 पद हजम कर जाता है तो कोई नियम को दरकिनार विभाग अलॉट करते हैं. 11-11 महीने से नियुक्ति नहीं मिले, यह तो सरकार पर ही सवाल है. छात्र भैरुलाल मीणा लिखते हैं कि कनिष्ठ अनुदेशक भर्ती-2016 को पूरी करवाकर अंतिम परिणाम जारी करवा दें. यह परीक्षा राजस्थान अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड द्वारा की गई थी.

सरकारों को देश में बढती बेरोजगारी के लिए केवल चुनावी मौसम में कही जाने वाली बातो तक ही सीमित नहीं रहना होगा. बल्कि उसको धरातल पर भी उतारना होगा, वरना कही ऐसा न हो कि सत्ता में बैठालने वाले युवा विमुख होकर सत्ता से बेदखल भी कर दें.

अगली सीरिज बुधवार को...किसी भर्ती का मुद्दा आप उठाना चाहते हैं तो आप हमें sarviind@gmail.com पर पूरी जानकारी भेजें.

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