दिल के किसी न किसी कोने में भड़ास जरूर तिलमिला रही होगी। भड़ास की आग जरूर निकालिए, ताकि जलने वाले बच न पाएं। sarviind@gmail.com परभेजें।

Sunday, June 14, 2009

एक खबर, दस लाइन और तीन रिपोर्टर, तीनों ने किया क्या!

अरविन्द शर्मा
दिल्ली के एक बड़े अखबार का मुख्य पेज देखकर तो एक दिन मैं चौंक ही "या। बिजली परियोजना से जुड़ी यह खबर पांच-छह लाइन की थीं। खबर में दो-दो रिपोर्टर का नाम था। इसी तरह राजस्थान के एक अखबार में महज दस लाइन की खबर में तीन-तीन रिपोर्टर का नाम ल"ा हुआ था। अब भई कोई यह तो बताए कि चार-पांच लाइन वाली खबर में दो और दस लाइन की खबर में तीन रिपोर्टर ने किया क्या था? कहीं ऐसा तो नहीं है कि एक रिपोर्टर बीट में "या हो, दूसरे ने फोन किया हो और तीसरे ने खबर कम्प्यूटर पर कंपोज की हो? अब सवाल उठता है कि बायलाइन (रिपोर्टर का नाम ल"ाने) के लिए क्या कोई 'संविधानÓ है या नहीं? यह सवाल मुझसे कई पत्रकार कर चुके हैं, लेकिन मैं हर बार यह कहकर उनकी बात टाल देता हूं कि पत्रकारों को और मिलता क्या है, उनके पास ले देकर एक बायलाइन ही तो है। पिछले दिनों एक पत्रकार साथी ने भी मुझसे ई-मेल के जरिए यह सवाल पूछा था।
कभी-कभी तो ऐसी खबरें भी बायलाइन के साथ पढऩे को मिल जाती हैं, जिनको देखकर हस्सी है कि रूकती ही नहीं। पहले तो वह खबर ही रिपोर्टर ने क्यों लिखी और दूसरा लिख भी दी तो बायलाइन वाली इसमें बात क्या है। बायलाइन की बढ़ती भूख के कारण हमारे कुछ पत्रकारसाथी एजेंसी की खबरें भी उठाने से नहीं चुक रहे हैं। एजेंसी की वेबसाइट खोली, खबर उठाई और हाथ-पैर तोड़े और फिर से जोड़े, और लो तैयार हो "ई बायलाइन खबर। अब ताजा उदाहरण स्वाइनफ्लू का ही लीजिए। दिल्ली के ही कुछ अखबारों ने इस खबर को रिपोर्टर के नाम के साथ के साथ परोसा तो तो कुछ ने 'मेट्रो, न"र, हमारे संवाददाताÓ की डेटलाइन ल"ाकर। अ"र उन खबरों को "ौर से पढ़ा जाएं तो भाषा के अलावा कोई फर्क नजर नहीं आता है। आंकड़ें और अधिकारियों से बातचीत तो एक ही है। तो क्या बायलाइन के लिए भी कोई संविधान बनाए जाने की जरुरत है।

2 comments:

अपणी मालवी अपणी मां said...

अरे अरविंदजी डरने वाली क्‍या बात है साफ साफ नाम लिखा करो अख़बार। सच तो सच है। इसमें ये लिखने की क्‍या जरूरत है कि एक बड़े अख़बार ने ऐसा किया है। और तो और कटिंग भ्‍ाी लगाया करो। आप जैसे लोग ही इस धीरे धीरे बिगड़ रही इस बिरादरी को सुधारेंगे। यहां दिल्‍ली में इकनॉमिक्‍स टाइम्‍स में भी ऐसा ही होता है। बाॅटम में ख़बर होती है। उसमें तीन नाम एक इंट्रो और एक ग्राफिक्‍स समझ नहीं आता कि तीन या चार रिपोर्टरों ने क्‍या किया है। इस पोस्‍ट के लिए बधाई
dharmendrabchouhan@blogspot.com
apanimalvi.blogspot.com

aligarhnews said...

अरे अरविंदजी डरने वाली क्‍या बात है साफ साफ नाम लिखा करो अख़बार। सच तो सच है। इसमें ये लिखने की क्‍या जरूरत है कि एक बड़े अख़बार ने ऐसा किया है। और तो और कटिंग भ्‍ाी लगाया करो। आप जैसे लोग ही इस धीरे धीरे बिगड़ रही इस बिरादरी को सुधारेंगे। यहां दिल्‍ली में इकनॉमिक्‍स टाइम्‍स में भी ऐसा ही होता है। बाॅटम में ख़बर होती है। उसमें तीन नाम एक इंट्रो और एक ग्राफिक्‍स समझ नहीं आता कि तीन या चार रिपोर्टरों ने क्‍या किया है।
aligarhnews@gmail.com
praween kumar,CNEBnews aligarh(UP)
MOB -9219129243.