अरविन्द शर्मा
खुद बदले या नहीं बदले, दूसरों को बदलने की जिद हर किसी पर सवार है। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। कुछ लोग मुझे बदलने के लिए हर संभव कोशिश कर रहे हैं। मैं भी सोच-सोच कर परेशान हो रहा था। सोच ही रहा था कि एक दोस्त के यहां कम्प्यूटर पर लता मंगेशकर का गाना सुनने को मिल गया। गाना था 'हम तो भई जैसे है, वैसे रहेंगे, अब कोई खुश हो या खफा, हम नहीं बदलेंगे अपनी अदा' बस फिर क्या था, अब हमने भी लता दीदी की तरह जिद ठान ली है कि हम किसी के कहने पर नहीं बदलेंगे। अब आप सोच रहे होंगे कि हममें कोई बुरी आदत होगी, तभी तो लोग हमे बदलना चाह रहे हैं। अरे जनाब ऐसा कुछ नहीं है। न तो हममें कोई बुरी आदत है और न ही दूसरों के दिलो-दीमाग में बुरी आदत डालते हैं।
'हम दिल के शहजादे हैं, मर्जी के मालिक'
हमने तो तय कर लिया है, हमें बदलने वालों को हम बदल देंगे। अब हमने तो यहां तक तय कर लिया है कि मोबाइल में क्यों न इसी गाने की कॉलर ट्यून डलवा ली जाए। ताकि इन लोगों को याद आता ही रहे कि 'हम दिल के शहजादे हैं, मर्जी के मालिक, हम तो भई जैसे है, वैसे रहेंगेÓ। पता नहीं कि कुछ लोगों को यह गंभीर रोग क्यों लग जाता है कि उनके अंदर की बुराईयां उन्हें नजर नहीं आती, बस दूसरों को बदलना ही अपना कर्म समझते हैं। खासकर आपके ईद-गिर्द के लोगों को यह बीमारी सबसे ज्यादा लगी होती है। शायद दूसरों की तरक्की के कारण यह बीमारी पैदा होती होगी। अब आप ही बताईए कि क्या मुझे बदलना चाहिए या नहीं? वो भी तब, दूसरे जिद करके बैठ जाए?
2 Comments
आपने खुद को न बदल कर उन लोगों को बदलने का ठाना है... अच्छा है...
शुभकामनायें.......
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