दिल के किसी न किसी कोने में भड़ास जरूर तिलमिला रही होगी। भड़ास की आग जरूर निकालिए, ताकि जलने वाले बच न पाएं। sarviind@gmail.com परभेजें।

Saturday, August 8, 2009

न कोई रंग है जमाने में लव-आज कल के सिवा

अरविन्द शर्मा
हमारे देश में प्रेम की परंपरा अनादिकाल से चली आ रही है। उस वक्त समाज की एनओसी की आवश्यकता नहीं थी। क्योंकि प्रेम सर्वथा पवित्रता के साथ किया जाता था। लेकिन आजकल का लव रंग बिरंगा हो गया है। और जब से 'लव आज कल' के दर्शन किए है, 'आज और कल' के प्यार को समझने की उत्सुकता भी बढ़ गई है। अब तो सोचते हैं कि जमाने में मुहब्बत के रंग को छोड़ दें तो क्या कोई रंग बचा ही नहीं है। ऋषी कपूर और सेफअली खान के प्यार की फिल्मी कहानी तो कम से कम यहीं बयां कर रही है। समाज की एनओसी को तो अब के प्रेमियों ने अंगूठा दिखा दिया है। यकिन नहीं हो तो किसी भी बाग-बगीची और सार्वजनिक स्थान पर गौर फरमाकर देख लीजिए। बात रही प्रेमिका के अनापत्ति प्रमाणपत्र की तो उसमें भी दो प्रकार का फलसफा प्रचलित है। एक बिना एनओसी के तथा दूसरा बाकायदा प्रेमिका से एनओसी लेकर। इसकी बानगी भी लव पॉइंटी पर मिल जाएगी। कुछ मामलों में वन साइडेड गेम भी चल रहा है। ऐसे मामलों को हम और आप दीवाना या पागल कहकर टाल देते हैं।
इकरार नहीं होता इजहार नहीं होता।चाहकर तो किसी से प्यार नहीं होता।कई राहें गुजर हम-सफर मिलते हैं।हाथ मिलाने से ही कोई प्यार नहीं होता।।
पहले कई बार सुनते हैं कि फलां मजनूं ने प्रेम में विफल रहकर अपनी जान दे दी, लेकिन अब के मजनूं 'दिलवाले दुल्हनियां ले जाएंगे' की तर्ज पर अपनी नायिका को प्राप्त करके ही रहते हैं। मेरे कहने का आशय है कि पहले प्रेम 'नीट एंड क्लीन' था मगर इस जमाने के प्रेमी तो अगल ही रंग में भीगे हुए हैं। अब तो नायिकाओं की पहली मांग यही होती है। क्या कर सकते हैं? यह क्या कर सकते हैं, यह पहले सोचना भी पाप समझा जाता था। शायद यहीं कारण था कि ऋषी कपूर को काफी संघर्ष के बाद (लव आज कल) में अपना प्यार मिला।लव आज कल के बारे में काफी सोचा मगर जवाब अभी तक नहीं मिला था। लिहाजा मैंने प्रेम पुजारियों को पकड़ लिया। उन्होंने समझाया कि बच्चू, यह 'नादान' भी 'दीवाना' और 'पागल' होता है। जाओ और अपने प्रेम का बेखौफ इजहार कर दो। बातों को सुनकर हौंसला काफी मिला और एक कदम आगे बढ़ा दिया कि आज तो प्रेम का इजहार करके ही रहूंगा। लेकिन इसी बीच एक पत्रकार भाई ने फोन पर सूचना दी कि पहाड़ी पर एक कोने में प्रेम की पींगे भर रहे दो मजनूओं को पुलिसियां डंडे ने प्रेम की अच्छी परिभाषा सिखा दी है। फिर क्या था सरकारी चिकित्सालय के हड्डी वार्ड में पलास्टर बंधी टांगों का दर्शय आंखों के सामने आ गया।
हकीकत के करीब आने के बाद।समझा मोहब्बत दिल लगाने के बाद।मुझे गम अपना कुछ नहीं, उसका है,कौन चाहेगा उसे इतना मेरे जाने के बाद।
दीमाग में ख्याल आया कि यह तो बहुत सावधानी का खेल है, जिसमें बॉलर द्वारा फेंकी जाने वाली गेंद को भली प्रकार से समझना पड़ता है अन्यथा कोई आश्चर्य नहीं कि पहली ही बॉल पर क्लीन बोर्ड कर दिए जाओ। वैसे सच पूछो तो मेरा 'नीट एंड क्लीन' में ही ज्यादा विश्वास है। निगुर्ण, निराकारी प्रेम ही हमारे हृदय में बसा हुआ है।
प्रभु जो करता है, ठीक करता है। वही देने वाला है, देवे तो छप्पर फाड़कर दे दे अन्यथा छप्पर ज्यों का त्यों बना रहे। कबीर ने प्रेम को ढाई आखर कहा है और इसके पढऩे वाले को ज्ञानी बताया है। इस लिहाज से मैं भी उन ज्ञानियों में से हंू जो हर कार्य सोच-समझकर करते हैं। ये जो प्रेम है न, यह भी बड़े काम की चीज है। आप भी करिए, क्योंकि यह करने का काम है।

0 comments: