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Thursday, August 13, 2009

ऐसा होता आया है, होता रहेगा

कैलाश राव
धरना, ज्ञापन और प्रदर्शन। अपने लोकतंत्र में यह तीनों ऐसे पुख्ता हथियार हैं कि इनसे हर तरह की लड़ाई लड़ी जा सकती है। चाहे वह नाजायज ही क्यों न हों। इस पर हमारे देश के कर्मठ कर्मचारियों का एकाधिकार है। जब चाहे तब ज्ञापन, इससे बात नहीं बनी तो प्रदर्शन और फिर भी मामला नहीं बैठे तो धरना। इससे आगे भी व्यवस्थाएं हैं, जैसे पुतला दहन, आमरण अनशन, भूख हड़ताल आदि-आदि।यूं तो इस अचूक शस्त्र का इस्तेमाल भाई लोग बरसों से करते आ रहे हैं लेकिन कुछ अरसे पहले इसका अपना कुछ स्टैंडर्ड था। कभी-कभी तो ये अपने वाले सरकारें हिला देते थे। समय के साथ इसका स्टैंडर्ड भले ही कम हुआ लेकिन इसकी उपयोगिता बढ़ गई। गुजरे कल की ही बात है मेरे शहर के नरेगाकर्मिर्यों ने स्थाई करने की मांग करते हुए कर डाला प्रदर्शन। अब, उन्हें कौन समझाए कि ठेके पर काम पाने वाला कर्मचारी जैसी उपमा से लाभान्वित नहीं हो सकता है। ठेके की अपनी शर्तें होती है और उन शर्तों में एक शर्त यह भी होती है कि वह राज का कारिंदा नहीं माना जाएगा। नरेगा का सुख भोग रहे मेरे एक मित्र को मैने यह बात बताने की जुर्रत कर डाली तो, वे बिफर पड़े और बोले, ठेके के समय भले ही हम कर्मचारी नहीं थे लेकिन आगे यह सुख लेने का प्रयास भी नहीं करें। हम भारतीय नागरिक है और हमें भी स्वतंत्रता का अधिकार है। उनके विचार जानकर मैं चुप। भला किसी के अधिकार का हनन मैं कैसे कर सकता हूं।सब कुछ साफ होने के बाद भी मन के कौने में एक बात रह-रहकर उठने का दुस्साहस किए बिना रहती कि सारे अधिकार इन धरना, प्रदर्शन के ठेकेदारों को ही क्यों मिलते हैं। ये भाई अपनी मांगे मनवाने के लिए उन करोड़ों लोगों के कितने ही अधिकारों को नेस्तनाबूत कर डालते हैं, जिनका दोष है तो इतना कि उन्हें जनता कहा जाता है। आरामदायक दफ्तरों में बैठे सरकार के नुमाइंदे कुछ न कुछ स्वार्थ के चलते ऐसे मुद्दों को हवा देते रहते हैं तो कर्मचारी नाम से अपनी पहचान रखने वाले उसमें घी डालने में पीछे नहीं रहते। दोनों की अपनी सैटिंग होती है लेकिन जनता जैसे जीव का आखिर क्या दोष है? खैर, यह मेरे से रुकने वाला नहीं, ऐसा होता आया है और होता रहेगा लेकिन...।

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